हमारे महल कौ नातौ साँचौ। [1]
याही के बल गरजत सब सों आवै नाहीं आँचौ॥ [2]
कुंजबिहारी ललित लाडिली इनही हिय में खाँचौ। [3]
श्रीहरिदासी रसिक सिरोमनि मन मिलि पोषत पाँचौ॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, सिद्धांत के पद (58)
श्री ललित किशोरी देव कह रहे हैं "हे भाई, श्री वृंदावन नवनिकुंज महल का अनन्य नाता ही हमारा सच्चा नाता है। [1]
क्योंकि महल के नाते बल पर ही हम सदा काल से गरजते रहे हैं। इसी कारण किसी भी प्रकार की माया की आँच हमारे पास नहीं आती। [2]
ललित लाड़िली श्री प्यारीजू एवं श्री कुंजबिहारी जू को अपने हृदय में भली प्रकार से विराजमान कर लो। [3]
रसिक शिरोमणि श्री स्वामी हरिदास जी के मन से अपना मन जोड़ दो और अपनी पांचों इंद्रियों को प्रेम रस से सींचते रहो।" [4]
याही के बल गरजत सब सों आवै नाहीं आँचौ॥ [2]
कुंजबिहारी ललित लाडिली इनही हिय में खाँचौ। [3]
श्रीहरिदासी रसिक सिरोमनि मन मिलि पोषत पाँचौ॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, सिद्धांत के पद (58)
श्री ललित किशोरी देव कह रहे हैं "हे भाई, श्री वृंदावन नवनिकुंज महल का अनन्य नाता ही हमारा सच्चा नाता है। [1]
क्योंकि महल के नाते बल पर ही हम सदा काल से गरजते रहे हैं। इसी कारण किसी भी प्रकार की माया की आँच हमारे पास नहीं आती। [2]
ललित लाड़िली श्री प्यारीजू एवं श्री कुंजबिहारी जू को अपने हृदय में भली प्रकार से विराजमान कर लो। [3]
रसिक शिरोमणि श्री स्वामी हरिदास जी के मन से अपना मन जोड़ दो और अपनी पांचों इंद्रियों को प्रेम रस से सींचते रहो।" [4]

