त्वयाकण्ठं पीतं यदि परमपीयूषमपि - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.46)

त्वयाकण्ठं पीतं यदि परमपीयूषमपि - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.46)

त्वयाकण्ठं पीतं यदि परमपीयूषमपि कि ततो यद्युर्वश्याः स्तनलयुगलमाश्लेषि किमतः।
यदि ब्रह्मानन्दामृतमपि समास्वादि किमतो यतस्थुत्कृत्येदं व्यसृजदपि वृन्दानतृणम॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.46)

यदि तुमन पेट भरकर अमृत भी पान कर लिया, तो उससे क्या? यदि उर्वशी के स्तनयुगल का तुमने आलिंगन कर लिया, तो क्या? और यदि ब्रह्मानन्द-अमृत का भी भली प्रकार आस्वादन तुम्हें मिले, तो भी उससे क्या फल? क्योंकि श्रीवृन्दावन के तो तृण ने भी इन समस्त वस्तुओं को थुत्कार कर त्याग कर दिया है।