अब तो कृपा करो श्री राधे! तुम्हरे द्वार परो श्री राधे!
हे श्री राधे, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ, अब तो कृपा कीजिये।
जात त्रिताप जरो श्री राधे! अवगुन चित न धरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मैं तीनों तापों (आधीभौतिक, आधीदैविक, अध्यात्मिक) से जला जा रहा हूँ, मेरे अवगून को चित मे न रखो।
चह शिशु बनी झगरो श्री राधे! माया मोह हरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मैं आपसे शिशु बन कर झगड़ना चाहता हूँ, मेरे माया मोह का नाश कीजिये श्री राधे।
हौं हौं पतित खरो श्री राधे! मम उर महँ विहरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मैं पतित हूँ, यह तो सत्य है, लेकिन दोषों को न देख मेरे हृदय मे विहार कीजिये हे श्री राधे।
मम पापन न डरो श्री राधे! शठ मन हठहिं अरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरे पापों को न देखिये। मेरा मन तो स्वभाव वश हठ पूर्वक पाप कर रहा है।
माया तिमिर हरो श्री राधे! बूडत कर पकरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरे माया के अंधकार का हरण कीजिये। मैं संसार सागर में डूब रहा हूँ, मेरा हाथ पकड़ कर मुझे उबारो श्री राधे।
अब जल नाव भरो श्री राधे! चह पद रति न टरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरी नैया तो पानी मे डूब रही है। मैं आपके चरण कमलों की नित्य रति चाहता हूँ श्री राधे।
अब जनी बेर करो श्री राधे! मम उर भगति भरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरे हृदय मे भक्ति का संचार कीजिये, अब देर न कीजिये।
मम अघ यमहुँ डरो श्री राधे! गलबहिंया दे दरस दीखा दे।
हे श्री राधे, मेरे पापों को देख यमराज भी डर रहे हैं, मेरे ऊपर कृपा कीजिये, मुझे आप श्री कृष्ण के संग गलबहियाँ दिये विहार करते हुये दर्शन दीजिये।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (32)
हे श्री राधे, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ, अब तो कृपा कीजिये।
जात त्रिताप जरो श्री राधे! अवगुन चित न धरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मैं तीनों तापों (आधीभौतिक, आधीदैविक, अध्यात्मिक) से जला जा रहा हूँ, मेरे अवगून को चित मे न रखो।
चह शिशु बनी झगरो श्री राधे! माया मोह हरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मैं आपसे शिशु बन कर झगड़ना चाहता हूँ, मेरे माया मोह का नाश कीजिये श्री राधे।
हौं हौं पतित खरो श्री राधे! मम उर महँ विहरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मैं पतित हूँ, यह तो सत्य है, लेकिन दोषों को न देख मेरे हृदय मे विहार कीजिये हे श्री राधे।
मम पापन न डरो श्री राधे! शठ मन हठहिं अरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरे पापों को न देखिये। मेरा मन तो स्वभाव वश हठ पूर्वक पाप कर रहा है।
माया तिमिर हरो श्री राधे! बूडत कर पकरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरे माया के अंधकार का हरण कीजिये। मैं संसार सागर में डूब रहा हूँ, मेरा हाथ पकड़ कर मुझे उबारो श्री राधे।
अब जल नाव भरो श्री राधे! चह पद रति न टरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरी नैया तो पानी मे डूब रही है। मैं आपके चरण कमलों की नित्य रति चाहता हूँ श्री राधे।
अब जनी बेर करो श्री राधे! मम उर भगति भरो श्री राधे!
हे श्री राधे, मेरे हृदय मे भक्ति का संचार कीजिये, अब देर न कीजिये।
मम अघ यमहुँ डरो श्री राधे! गलबहिंया दे दरस दीखा दे।
हे श्री राधे, मेरे पापों को देख यमराज भी डर रहे हैं, मेरे ऊपर कृपा कीजिये, मुझे आप श्री कृष्ण के संग गलबहियाँ दिये विहार करते हुये दर्शन दीजिये।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (32)

