(राग गौरी)
(श्री) राधावल्लभ के गुन गाइ लेहु। [1]
तजहु असाधु संग भजि साधुनि, हरिसौं हित उपजाइ लेहु॥ [2]
वृंदावन निरुपाधि राधिकारवन सौं प्रीति बढ़ाइ लेहु । [3]
नव निकुंज सुख पुंजनि वरषत, नैंननि सुख दिखराइ लेहु॥ [4]
पावन पुलिन रासमंडल में, मन दै तनहि नचाइ लेहु। [5]
गदगद स्वर पुलकित कोमल चित, आनँद नीर बहाइ लेहु॥ [6]
विमद विमत्सर रसिक अनन्य, चरन रज सिर लपटाइ लेहु। [7]
इहिं विधि महाप्रसादहि पावत, सहचरि व्यास कहाइ लेहु॥ [8]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (217)
हे मन, श्री राधावल्लभ के गुणों का गान कर। [1]
असाधुओं का त्याग करते हुए, संतों का नित्य संग कर, भजन का अभ्यास कर और श्री हरि चरणों में प्रेम को बढा। [2]
वृंदावन में श्री कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को बढ़ा और अपने चित्त को सभी उपाधियों से रहित बना। [3]
वृंदावन में नवल निकुंज वन में अमृत की वर्षा हो रही है, अपनी आंखों को इसकी सुंदरता को निहारने दें। [4]
यमुना के किनारे रास मंडल में, मन में उत्साह भर के नृत्य कर। [5]
वाणी को गदगद कर, ह्रदय को पुलकित कर, आंखों से आनंद के आंसू बहा ले। [6]
अपने सिर पे 'रसिक अनन्य' (श्री राधा के अनन्य रसिक भक्तों) के चरण कमलों की रज चढ़ा ले। [7]
श्री हरिराम व्यास अपने मन से कहते हैं, "इस प्रकार, 'महाप्रसाद' को स्वीकार कर और स्वयं को सहचरी स्वरूप में चिंतन कर।" [8]
(श्री) राधावल्लभ के गुन गाइ लेहु। [1]
तजहु असाधु संग भजि साधुनि, हरिसौं हित उपजाइ लेहु॥ [2]
वृंदावन निरुपाधि राधिकारवन सौं प्रीति बढ़ाइ लेहु । [3]
नव निकुंज सुख पुंजनि वरषत, नैंननि सुख दिखराइ लेहु॥ [4]
पावन पुलिन रासमंडल में, मन दै तनहि नचाइ लेहु। [5]
गदगद स्वर पुलकित कोमल चित, आनँद नीर बहाइ लेहु॥ [6]
विमद विमत्सर रसिक अनन्य, चरन रज सिर लपटाइ लेहु। [7]
इहिं विधि महाप्रसादहि पावत, सहचरि व्यास कहाइ लेहु॥ [8]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (217)
हे मन, श्री राधावल्लभ के गुणों का गान कर। [1]
असाधुओं का त्याग करते हुए, संतों का नित्य संग कर, भजन का अभ्यास कर और श्री हरि चरणों में प्रेम को बढा। [2]
वृंदावन में श्री कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को बढ़ा और अपने चित्त को सभी उपाधियों से रहित बना। [3]
वृंदावन में नवल निकुंज वन में अमृत की वर्षा हो रही है, अपनी आंखों को इसकी सुंदरता को निहारने दें। [4]
यमुना के किनारे रास मंडल में, मन में उत्साह भर के नृत्य कर। [5]
वाणी को गदगद कर, ह्रदय को पुलकित कर, आंखों से आनंद के आंसू बहा ले। [6]
अपने सिर पे 'रसिक अनन्य' (श्री राधा के अनन्य रसिक भक्तों) के चरण कमलों की रज चढ़ा ले। [7]
श्री हरिराम व्यास अपने मन से कहते हैं, "इस प्रकार, 'महाप्रसाद' को स्वीकार कर और स्वयं को सहचरी स्वरूप में चिंतन कर।" [8]

