(कवित्त)
राधा गुन गावैं तहाँ दौर दौर जाओ प्यारे,
राधा गुन है न जहाँ भूल कें न डट रे। [1]
राधे जू की चरचा सलोनी लौनी होय जहाँ,
सुनिये लगाय श्रुति तहाँ ते न हट रे॥ [2]
राधा राधा नाम ही सों काम राख आठौं जाम,
'लाल बलबीर' जग जाल कों न ठट रे। [3]
एरे मन मेरे चेत भूल कें न हो अचेत,
राधे रट राधे रट राधे राधे रट रे॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, श्री ब्रज-विनोद, श्री राधा शतक (97)
राधा गुन गावैं तहाँ दौर दौर जाओ प्यारे,
राधा गुन है न जहाँ भूल कें न डट रे। [1]
राधे जू की चरचा सलोनी लौनी होय जहाँ,
सुनिये लगाय श्रुति तहाँ ते न हट रे॥ [2]
राधा राधा नाम ही सों काम राख आठौं जाम,
'लाल बलबीर' जग जाल कों न ठट रे। [3]
एरे मन मेरे चेत भूल कें न हो अचेत,
राधे रट राधे रट राधे राधे रट रे॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, श्री ब्रज-विनोद, श्री राधा शतक (97)
हे मेरे मन, उस स्थान पर दौड़कर जा जहाँ श्री राधा नाम का गुणगान किया जाता है। भूलकर भी कभी उस स्थान पर न रुकना, जहाँ श्री राधारानी का गुणगान न हो। [1]
जहाँ कहीं भी श्री राधारानी की लीलाओं की सलोनी चर्चा हो रही हो, अपने कानों को उसे सुनने के लिए सदैव तत्पर रखना, और वहाँ से प्रस्थान कभी न करना। [2]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं, "अपना एकमात्र काम दिन-रात 'राधा राधा' नाम से ही रखो और स्वयं को जगजाल से बचाकर रखो।" [3]
हे मेरे मन, अब सचेत हो और भूलकर भी अचेत न होना, राधा रट, राधा रट, हर क्षण राधा राधा ही रट। [4]

