उज्जागरं रसिकनागरसंगरंगैः कुंजोदरे कृतवती नु मुदा रजन्याम्।
सुस्नापिता हि मधुनैव सुभोजिता त्वं राधे कदा स्वपिषि मत्करलालितांघ्रि॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (16)
हे श्री राधे ! तुमने अपने प्रियतम रसिक नागर श्रीलालजी के संग कुञ्ज-भवन में आनंद-विहार करते हुए मोद में ही सम्पूर्ण रात्रि जागरण कर व्यतीत कर दी हो तब प्रातः काल मैं तुम्हें अच्छी प्रकार से स्नान कराकर मधुर-मधुर भोजन कराऊँ और सुखद शय्या पर पौढ़ाकर अपने कोमल करों से तुम्हारे ललित चरणों का संवाहन करूं। मेरा ऐसा सौभाग्य कब होगा ?
सुस्नापिता हि मधुनैव सुभोजिता त्वं राधे कदा स्वपिषि मत्करलालितांघ्रि॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (16)
हे श्री राधे ! तुमने अपने प्रियतम रसिक नागर श्रीलालजी के संग कुञ्ज-भवन में आनंद-विहार करते हुए मोद में ही सम्पूर्ण रात्रि जागरण कर व्यतीत कर दी हो तब प्रातः काल मैं तुम्हें अच्छी प्रकार से स्नान कराकर मधुर-मधुर भोजन कराऊँ और सुखद शय्या पर पौढ़ाकर अपने कोमल करों से तुम्हारे ललित चरणों का संवाहन करूं। मेरा ऐसा सौभाग्य कब होगा ?

