हारनि के भार भारी ऐसी सुकुमारी प्यारी - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (34)

हारनि के भार भारी ऐसी सुकुमारी प्यारी - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (34)

हारनि के भार भारी ऐसी सुकुमारी प्यारी,
रसिक रँगीले लाल कीन्हीं उर-हार सी। [1]
छबि के तमाल लपटानी रूप बेलि मानौं,
हँसनि दसनि फूल फूले सुख-सार सी॥ [2]
नख-सिख जगमगै रौंम-रौंम प्रतिबिंब,
लसत है ऐसैं जैसैं आरसी में आरसी। [3]
'हित ध्रुव' इहि बिधि देखैं सखी चित्र भईं,
चहूँ कोद रही झूमि कंचन की डार सी॥ [4]

- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (34)

प्रियतम की प्यारी श्री राधा ऐसी सुकुमारी हैं, जिन्हें हारावली का अल्प सा भार भी बहुत भारी प्रतीत होता है, फिर भी प्रेमावेश में उन्होंने रसिक रँगीले लाल को अपना हृदय-हार बना रखा है। [1]

उनकी यह छवि ऐसी लगती है, जैसे किसी सुंदर छबिमय तमाल-तरु से रूप-सौंदर्य की लता आलिंगित हो, जिसमें मुस्कान और दशन-द्युति के आनंद-पुष्प विकसित हो रहे हों। [2]

रोम-रोम से लेकर नख-शिख तक उनका रूप ऐसे झलमलाता रहता है, मानो दर्पण में दर्पण प्रतिबिम्बित हो रहा हो। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि सुकुमारी प्रिया की ऐसी छवि-छटा का दर्शन करके सखियाँ चित्रलिखित सी रह गई हैं और वे प्रेम-विवश युगल के चारों ओर स्वर्ण लताओं की तरह झूम रही हैं। [4]