(राग कल्याण)
लोग तो भूलैं भलैं भूलैं तुम जिनी भूलौ मालाधारी। [1]
अपनौं पति छांडि औरनि सौं रति ज्यों दारनि में दारी॥ [2]
स्याम कहत ते जीव मोते विमुख भए जिन दूसरि करि डारी। [3]
कहिं श्री हरीदास जग्य देवता ,पितरनि कौं श्रद्धा भारी॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (16)
इस पद में स्वामी श्रीहरिदासजी अपने आश्रित भक्तों के प्रति स्नेह से भरे हुए कहते हैं कि, “हे मेरे प्रिय भक्तों! सामान्य लोग तो श्रीबिहारीजी के अनन्य आश्रय को भूल सकते हैं, लेकिन तुम तो अब हमारे हो चुके हो। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए; तुम क्यों उन्हें भूल रहे हो?” [1]
वे समझाते हैं कि किसी भी स्थिति में तुम्हें श्रीबिहारीजी को नहीं भूलना चाहिए। जैसे एक स्त्री यदि अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष से प्रेम करती है, तो उसे व्यभिचारिणी कहा जाता है और उसकी दुर्दशा होती है, वैसे ही अगर तुम श्रीबिहारीजी को छोड़ किसी अन्य पर आश्रित होते हो, तो तुम्हारी भी स्थिति वैसी ही होगी। [2]
स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो जीव मेरी शरण में आकर भी अन्य किसी की शरण में किसी आशा से जाते हैं, वे मुझसे विमुख हो जाते हैं। जब तुमने एक बार श्रीबिहारीजी की अनन्य शरण ग्रहण कर ली है, तब तुम्हें संसार के किन्हीं अन्य कर्मकांडों, धर्मों या लोक-मर्यादाओं के पालन की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं रह जाती। [3]
स्वामी हरिदासजी महाराज अंत में कहते हैं कि जब कोई भक्त करुणा-सिंधु श्रीबिहारीजी महाराज की शरण में जाता है, तब उसके लिए यज्ञ, देव-पूजा, पितृ-ऋण या अन्य किसी कर्मकांड की आवश्यकता शेष नहीं रहती। केवल श्रीबिहारीजी के रसमय अनुराग में निमग्न रहना ही उसकी सर्वोच्च सिद्धि और एकमात्र धर्म है। [4]
लोग तो भूलैं भलैं भूलैं तुम जिनी भूलौ मालाधारी। [1]
अपनौं पति छांडि औरनि सौं रति ज्यों दारनि में दारी॥ [2]
स्याम कहत ते जीव मोते विमुख भए जिन दूसरि करि डारी। [3]
कहिं श्री हरीदास जग्य देवता ,पितरनि कौं श्रद्धा भारी॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (16)
इस पद में स्वामी श्रीहरिदासजी अपने आश्रित भक्तों के प्रति स्नेह से भरे हुए कहते हैं कि, “हे मेरे प्रिय भक्तों! सामान्य लोग तो श्रीबिहारीजी के अनन्य आश्रय को भूल सकते हैं, लेकिन तुम तो अब हमारे हो चुके हो। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए; तुम क्यों उन्हें भूल रहे हो?” [1]
वे समझाते हैं कि किसी भी स्थिति में तुम्हें श्रीबिहारीजी को नहीं भूलना चाहिए। जैसे एक स्त्री यदि अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष से प्रेम करती है, तो उसे व्यभिचारिणी कहा जाता है और उसकी दुर्दशा होती है, वैसे ही अगर तुम श्रीबिहारीजी को छोड़ किसी अन्य पर आश्रित होते हो, तो तुम्हारी भी स्थिति वैसी ही होगी। [2]
स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो जीव मेरी शरण में आकर भी अन्य किसी की शरण में किसी आशा से जाते हैं, वे मुझसे विमुख हो जाते हैं। जब तुमने एक बार श्रीबिहारीजी की अनन्य शरण ग्रहण कर ली है, तब तुम्हें संसार के किन्हीं अन्य कर्मकांडों, धर्मों या लोक-मर्यादाओं के पालन की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं रह जाती। [3]
स्वामी हरिदासजी महाराज अंत में कहते हैं कि जब कोई भक्त करुणा-सिंधु श्रीबिहारीजी महाराज की शरण में जाता है, तब उसके लिए यज्ञ, देव-पूजा, पितृ-ऋण या अन्य किसी कर्मकांड की आवश्यकता शेष नहीं रहती। केवल श्रीबिहारीजी के रसमय अनुराग में निमग्न रहना ही उसकी सर्वोच्च सिद्धि और एकमात्र धर्म है। [4]

