बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना तें रहित, प्रेम सकल रसखानि॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (15)
सुद्ध कामना तें रहित, प्रेम सकल रसखानि॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (15)
श्री रसखान कहते हैं— ‘गुणों के बिना यौवन, रूप और धन सब व्यर्थ हैं, और अपने हित के बिना कोई किसी से सच्चा हित नहीं करता। दूसरी ओर प्रेम विशुद्ध होता है—वह समस्त कामनाओं से रहित और समस्त रसों की खान है।’

