(राग टोड़ी) [शय्या समय]
आजु देखि व्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि। [1]
अंस अंस बाहु दै किसोर जोर रूप रासि,
मनौं तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि॥ [2]
नव निकुंज भ्रमर गुंज, मंजु घोष प्रेम पुंज,
गान करत मोर पिकनि अपने सुर सौं मेलि। [3]
मदन मुदित अंग अंग, बीच बीच सुरत रंग,
पलु पलु हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि॥ [4]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (17)
भावार्थ - (श्रीहित सजनी कहती हैं-) "सखियों! देखो आज ब्रज सुंदरी श्रीराधा और मोहन की क्रीड़ा (कैसी भली) बनी है। [1]
रूप की राशि युगल किशोर परस्पर एक के स्कन्ध पर दूसरे की बाहुलता लपेट कर ऐसे शोभित हैं मानो तमाल (द्रुम) से सरस स्वर्ण बेलि लिपट रही हो। [2]
नव निकुञ्ज में भ्रमर समूह का सुन्दर और मधुर गुञ्जार हो रहा है। गुञ्जार क्या है प्रेमपुञ्ज है उस गुञ्जन से अपना-अपना स्वर मिलाकर मयूर और कोयल भी गान कर रहे हैं। [3]
इधर युगल किशोर भी अंग-अंग से प्रेम मुदित होकर बीच बीच में सुरत आनन्द ले रहे हैं और हरिवंश चन्द्र (सजनी रूप से) इस आनन्द रस को अपने नयन पात्रों में झेल कर प्रति पल पान कर रहे है।(अर्थात् दर्शन का रस पी रहे हैं) [4]
आजु देखि व्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि। [1]
अंस अंस बाहु दै किसोर जोर रूप रासि,
मनौं तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि॥ [2]
नव निकुंज भ्रमर गुंज, मंजु घोष प्रेम पुंज,
गान करत मोर पिकनि अपने सुर सौं मेलि। [3]
मदन मुदित अंग अंग, बीच बीच सुरत रंग,
पलु पलु हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि॥ [4]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (17)
भावार्थ - (श्रीहित सजनी कहती हैं-) "सखियों! देखो आज ब्रज सुंदरी श्रीराधा और मोहन की क्रीड़ा (कैसी भली) बनी है। [1]
रूप की राशि युगल किशोर परस्पर एक के स्कन्ध पर दूसरे की बाहुलता लपेट कर ऐसे शोभित हैं मानो तमाल (द्रुम) से सरस स्वर्ण बेलि लिपट रही हो। [2]
नव निकुञ्ज में भ्रमर समूह का सुन्दर और मधुर गुञ्जार हो रहा है। गुञ्जार क्या है प्रेमपुञ्ज है उस गुञ्जन से अपना-अपना स्वर मिलाकर मयूर और कोयल भी गान कर रहे हैं। [3]
इधर युगल किशोर भी अंग-अंग से प्रेम मुदित होकर बीच बीच में सुरत आनन्द ले रहे हैं और हरिवंश चन्द्र (सजनी रूप से) इस आनन्द रस को अपने नयन पात्रों में झेल कर प्रति पल पान कर रहे है।(अर्थात् दर्शन का रस पी रहे हैं) [4]

