भगवत नित्य बिहार, नैन संकर का तीजा।
जाती बर्न कुल धर्म कर्म, राखत नहीं बीजा॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (42)
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि यह 'नित्य-विहार' भगवान शिव के तीसरे नेत्र के समान है, जो समस्त द्वैत और अज्ञान को भस्म कर देता है। इसके प्रकटीकरण के साथ ही चित्त से जाति, वर्ण, कुल, धर्म एवं कर्म के समस्त वैषम्य समूल विनष्ट हो जाते हैं। केवल श्री राधा–कृष्ण की युगल-छवि ही अवशिष्ट रह जाती है।
जाती बर्न कुल धर्म कर्म, राखत नहीं बीजा॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (42)
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि यह 'नित्य-विहार' भगवान शिव के तीसरे नेत्र के समान है, जो समस्त द्वैत और अज्ञान को भस्म कर देता है। इसके प्रकटीकरण के साथ ही चित्त से जाति, वर्ण, कुल, धर्म एवं कर्म के समस्त वैषम्य समूल विनष्ट हो जाते हैं। केवल श्री राधा–कृष्ण की युगल-छवि ही अवशिष्ट रह जाती है।

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