किशोरी जु कि, मधुर मधुर मुसकान - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा–माधुरी

किशोरी जु कि, मधुर मधुर मुसकान - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा–माधुरी

किशोरी जु कि, मधुर मधुर मुसकान।
नहिं बिसरत मोहिं एकहुँ छिन कहँ, नीलाम्बर लहरान॥ [1]
मणिमय मुकुट चंद्रिका तापर, तापर लर मुक्तान।
एँड़ी कहँ वेणी चूमन चह, बाँकी भृकुटि कमान॥ [2]
खंजन–मंजु रसीले नैननि, मोहति श्याम सुजान।
लखि ‘कृपालु’ हम भोरे मुख पर, वारत तन मन प्रान॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा–माधुरी (8)

भावार्थ:-श्री किशोरी जी की मुस्कान अत्यन्त ही मीठी है। उनके नीलाम्बर की फहरान मुझे एक क्षण को भी नहीं भूलती। [1]
मणियों से जड़े हुए उनके मुकुट के ऊपर चन्द्रिका चमक रही है एवं उसके ऊपर मोतियों की लड़ियाँ लटक रही हैं। उनकी वेणी तो मानो एड़ी को ही चूमना चाहती है। उनकी भौंहें धनुष के समान अत्यन्त सुन्दर हैं। [2]
खंजन पक्षी से भी अत्यन्त सुन्दर उनके रस भरे नयन श्यामसुन्दर को मोहित करते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम तो उनके भोले मुख को देखकर ही अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व न्यौछावर करते हैं । [3]