और देस के बसत ही - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (56)

और देस के बसत ही - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (56)

और देस के बसत ही, घटत भजन की बात।
वृन्दावन में स्वारथौ, उलटि भजन ह्वै जात॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (56)

अन्य देशों में वास करने से भजन क्रमशः क्षीण होता जाता है, किन्तु श्री वृन्दावन में तो स्वार्थ-पूर्ति की चेष्टा भी भजन का ही रूप धारण कर लेती है।