(राग केदारो)
मेरे भाँवते स्यामा स्याम।
रास विलास करत वृंदावन, विविध विनोद ललाम॥ [1]
नख सिख अंग लुभारे प्यारे, ज्यौं लोभीनिकौं दाम।
रूप अवधि, गुन जलधि रंगनिधि, सब विधि पूरन काम॥ [2]
मंदहँसनि छबि छली अलिहि, बंकविलोकनि वाम।
व्यास विहार निहारति रसिकनि, भूले तन धन धाम॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (135)
मुझे तो श्री श्यामा श्याम की युगल जोरी ही आकर्षित करती है। यह दिव्य जोरी नित्य रास विलास परायण अनेक प्रकार की विनोद लीलाएं करते हुए वृंदावन में विचरण करती है। [1]
श्री राधा कृष्ण की छबि नख शिख पर्यन्त बड़ी ही लुभाने वाली है, जैसे धन किसी लोभी को लुभाता है। रूप की तो यह सीमा हैं एवं गुणों के सागर हैं, रंग की निधि एवं समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। [2]
इनकी छवि मंदहास युक्त है, एवं इनकी तिरछी चितवन ने सखियों के मन को चुरा लिया है। श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "वह रसिकनी श्री राधारानी की इस अद्भुत विहार को निहार अपने तन, धन और निवास को भूले जा रहे हैं"। [3]
मेरे भाँवते स्यामा स्याम।
रास विलास करत वृंदावन, विविध विनोद ललाम॥ [1]
नख सिख अंग लुभारे प्यारे, ज्यौं लोभीनिकौं दाम।
रूप अवधि, गुन जलधि रंगनिधि, सब विधि पूरन काम॥ [2]
मंदहँसनि छबि छली अलिहि, बंकविलोकनि वाम।
व्यास विहार निहारति रसिकनि, भूले तन धन धाम॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (135)
मुझे तो श्री श्यामा श्याम की युगल जोरी ही आकर्षित करती है। यह दिव्य जोरी नित्य रास विलास परायण अनेक प्रकार की विनोद लीलाएं करते हुए वृंदावन में विचरण करती है। [1]
श्री राधा कृष्ण की छबि नख शिख पर्यन्त बड़ी ही लुभाने वाली है, जैसे धन किसी लोभी को लुभाता है। रूप की तो यह सीमा हैं एवं गुणों के सागर हैं, रंग की निधि एवं समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। [2]
इनकी छवि मंदहास युक्त है, एवं इनकी तिरछी चितवन ने सखियों के मन को चुरा लिया है। श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "वह रसिकनी श्री राधारानी की इस अद्भुत विहार को निहार अपने तन, धन और निवास को भूले जा रहे हैं"। [3]

