त्यक्त्वा वृन्दावनमिदमहो चेद्बहिर्यासि नूनंक्षिप्त्वा कल्पद्रुमवरवनं हन्त शाखोटमेषि।
हित्वा वृन्दावन-रसकथामन्यवार्ता-रुचिश्चेज्ज्ञातं क्षिप्त्वा परमममृतं भोक्तुमिच्छुः श्वविष्ठाम्॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.67 )
यदि इस वृन्दावन को त्याग कर तू अन्यत्र जाये, तो सचमुच तू कल्पवक्षों के श्रेष्ठ वन को छोड़ कर सिहोर के जंगल में जाता है। यदि वृन्दावन के रस की कथा को छोड़ कर और वार्ता तुम्हें अच्छी लगे, तब तू जान ले कि उत्तमोत्तम अमृत को त्याग कर कुत्ते की विष्ठा भोजन करने की तुम्हारी इच्छा होती है।
हित्वा वृन्दावन-रसकथामन्यवार्ता-रुचिश्चेज्ज्ञातं क्षिप्त्वा परमममृतं भोक्तुमिच्छुः श्वविष्ठाम्॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.67 )
यदि इस वृन्दावन को त्याग कर तू अन्यत्र जाये, तो सचमुच तू कल्पवक्षों के श्रेष्ठ वन को छोड़ कर सिहोर के जंगल में जाता है। यदि वृन्दावन के रस की कथा को छोड़ कर और वार्ता तुम्हें अच्छी लगे, तब तू जान ले कि उत्तमोत्तम अमृत को त्याग कर कुत्ते की विष्ठा भोजन करने की तुम्हारी इच्छा होती है।

