पादांगुलीनिहितदृष्टिमपत्रपिष्णुं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (15)

पादांगुलीनिहितदृष्टिमपत्रपिष्णुं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (15)

पादांगुलीनिहितदृष्टिमपत्रपिष्णुं दूरादुदीक्ष्य रसिकेन्द्रमुखेन्दुविम्बम्।
वीक्षे चलत्पदगतिं चरिताभिरामां झंकारनूपुरवतीं वत कर्हि राधाम्॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (15)

अपने प्रियतम रसिक-शेखर श्रीलाल जी के मुखचन्द्र मण्डल को दूर से ही देखकर जिन्होंने लज्जा से भरकर अपनी दृष्टि को अपने ही चरणों की अंगुलियों में निहित कर दिया है और फिर जो सलज्ज गति से (निकुंज-भवन की ओर) चल पड़ी है, जिससे चरण-नूपुर झंकृत हो उठे हैं। हाय ! वे अभिराम-चरिता श्रीराधा क्या कभी मुझे दर्शन देंगी?