जै जै आनन्द कन्दनी, श्रीहरिप्रिया किसोरि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा-सुख (48)

जै जै आनन्द कन्दनी, श्रीहरिप्रिया किसोरि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा-सुख (48)

(राग गौरी)
(दोहा)
जै जै आनन्द कन्दनी, श्रीहरिप्रिया किसोरि।
जै जै राधा रसिकिनी, रसिक बिहारी जोरि॥

(पद)
जै जै राधा रसिकिनी। रसिक बिहारी जोरी बनी॥ [1]
जै जै स्यामा लाड़िली। मन मोहन मन चाड़िली॥
जै जै रूप उजागरी। नित्य नवीना नागरी॥ [2]
जै जै आनन्द कन्दनी। जन जीवनि जग बन्दनी॥
जै जै सब सुख धामिनी। श्रीहरिप्रिया जै स्वामिनी॥ [3]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा-सुख (48)

(दोहा)
श्रीराधा रसिकनी और रसिक-बिहारी की इस युगल-छवि की सदा जय हो। ये श्रीहरि और श्रीप्रिया परमानन्द के मूल-स्वरूप हैं और नित्य ही किशोर अवस्था में सुशोभित रहते हैं।

(पद)
श्री राधा रसिकिनी और रसिक बिहारी की इस जोरी की सदा जय हो। [1]

श्री श्यामा लाड़िली की जय हो जो मन मोहन की चाह की मूर्ति हैं। प्रकाशमान रूप वाली श्रीप्रियाजू की जय हो जो नित्य नवीन नागरी स्वरूप हैं। [2]

आनन्द की भी मूल स्वरूपा श्रीलड़ैतीजू की जय हो जो जग-वन्दन श्रीलालजू की भी वन्दनीय हैं। सब सुख धाम स्वरूपा श्रीप्यारीजू की जय हो जो श्रीहरिप्रियाजू की स्वामिनी हैं। [3]