दीजै मोहि वास व्रज माहीं।
जुगल नाम कौ भजन निरन्तर, और कदम्बन छाहीं॥ [1]
व्रज बासिन के जूठन टूका, अरु जमुना कौ पानी।
रसिकन की सत संगति दीजै, सुनिवो रस भरी बानी॥ [2]
कुंजन कौ नित डौलिबौ दीजै, दीजौ भोर बुहारी।
मिलवे की हिय माँहि चटपटी, प्रीति हिये अति भारी॥ [3]
कोटि प्राण नित बारिबौ दीजै, देखत चरण छटारी।
इतनी आस पुजावहु प्यारी, भोरी बलि बलिहारी॥ [4]
- भोरी सखी (श्री भोलानाथ जी), प्रेम की पीर (144)
हे श्री राधे, अपने दिव्य श्री ब्रज धाम में निवास प्रदान कर मुझ पर अनुग्रह करें।
मैं कब श्री वृंदावन में कदंब की लताओं की छांव में बैठूंगा और दिन-रात युगल नाम का भजन करूंगा। [1]
रसिक संतों के उच्छिष्ट मैं कब पाऊंगा, और यमुना नदी का पवित्र जल पीऊँगा।
मैं रसिक संतों की संगति कब करूंगा, और श्री राधा कृष्ण की अमृतमयी रस वार्ता कब सुनूंगा। [2]
ऐसा कब होगा की मैं वृंदावन के विभिन्न लीला स्थलियों में विचरण करूँगा, और हर सुबह महल में झाड़ू लगाऊंगा?
कब मेरे ह्रदय में आपसे मिलने के लिए व्याकुलता बढ़ेगी और कब ह्रदय प्रेम से परिपूर्ण होगा? [3]
हे श्री राधा, मैं कब आपके चरण कमलों को निहारने के लिए लाखों प्राणों को बलिहारूँगा।
भोरी सखी कहते हैं, “मेरी केवल यही इच्छा है, कृपया इसे पूरा करें। मैं बार-बार आप पर अपने आप को न्योछावर करता हूँ! " [4]
जुगल नाम कौ भजन निरन्तर, और कदम्बन छाहीं॥ [1]
व्रज बासिन के जूठन टूका, अरु जमुना कौ पानी।
रसिकन की सत संगति दीजै, सुनिवो रस भरी बानी॥ [2]
कुंजन कौ नित डौलिबौ दीजै, दीजौ भोर बुहारी।
मिलवे की हिय माँहि चटपटी, प्रीति हिये अति भारी॥ [3]
कोटि प्राण नित बारिबौ दीजै, देखत चरण छटारी।
इतनी आस पुजावहु प्यारी, भोरी बलि बलिहारी॥ [4]
- भोरी सखी (श्री भोलानाथ जी), प्रेम की पीर (144)
हे श्री राधे, अपने दिव्य श्री ब्रज धाम में निवास प्रदान कर मुझ पर अनुग्रह करें।
मैं कब श्री वृंदावन में कदंब की लताओं की छांव में बैठूंगा और दिन-रात युगल नाम का भजन करूंगा। [1]
रसिक संतों के उच्छिष्ट मैं कब पाऊंगा, और यमुना नदी का पवित्र जल पीऊँगा।
मैं रसिक संतों की संगति कब करूंगा, और श्री राधा कृष्ण की अमृतमयी रस वार्ता कब सुनूंगा। [2]
ऐसा कब होगा की मैं वृंदावन के विभिन्न लीला स्थलियों में विचरण करूँगा, और हर सुबह महल में झाड़ू लगाऊंगा?
कब मेरे ह्रदय में आपसे मिलने के लिए व्याकुलता बढ़ेगी और कब ह्रदय प्रेम से परिपूर्ण होगा? [3]
हे श्री राधा, मैं कब आपके चरण कमलों को निहारने के लिए लाखों प्राणों को बलिहारूँगा।
भोरी सखी कहते हैं, “मेरी केवल यही इच्छा है, कृपया इसे पूरा करें। मैं बार-बार आप पर अपने आप को न्योछावर करता हूँ! " [4]

