वरमिह वृन्दारण्ये सुवराकी मदनमोहनद्वारि - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (2.67 )

वरमिह वृन्दारण्ये सुवराकी मदनमोहनद्वारि - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (2.67 )

वरमिह वृन्दारण्ये सुवराकी मदनमोहनद्वारि।
अपि सरमापि रमाप्रियसख्यपि नान्यत्र नो रमापि स्याम्॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (2.67 )

इस श्रीवृन्दावन में श्री राधा मदमोहन के दरवाजे पर तुच्छ कुक्करी (कुतिया) होकर भले ही रहूँगा, तथापि और जगह लक्ष्मी की प्यारी सखी अथवा स्वयं लक्ष्मी बनकर भी रहने की इच्छा नहीं है।