जोरी विचित्र बनाई री माई - श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (4)

जोरी विचित्र बनाई री माई - श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (4)

(राग कान्हरौ)
जोरी विचित्र बनाई री माई काहू मन के हरन कौं। [1]
चितवत दृष्टि टरत नहीं इत उत
मन वच क्रम याही संग भरन कौं॥ [2]
ज्यौं घन दामिनि संग रहत नित
बिछुरत नाहींन और वरन कौं। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुँजबिहारी न टरन कौं॥ [4]

- श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (4)

निकुंज महल में प्रिया प्रियतम शैया पर बैठे एक दूसरे का मुख दर्शन करते हुए परस्पर एकटक निहार रहे हैं। आपस की प्रीति ऐसी है कि उन्हें ना दिवस की खबर है ना रात की। दंपति की आसक्तता सुख को सखी जन निरख निरख तृप्त नहीं हो पा रही हैं।
ललिता सखी हरिदासी जी कह रही हैं - यह जोड़ी अति अद्भुत विचित्र है। इनके अंग अंग रस से भरे हैं। मन ही मन में रस की तरंगे उठ रही हैं, वे विचित्र हैं। प्रिया जी ने लाल के मन को तथा लाल जी ने प्रिया के मन का हरण कर लिया है। [1]
प्यारी जी का रूप अद्भुत है, जिसे देख प्यारी ही मोह जाती हैं। ऐसे में प्यारे का क्या कहना। लाल जी की दृष्टि प्रिया पर तथा प्रिया की दृष्टि लालजी पर टिकी है, तनिक भी इधर-उधर नहीं जाती। दोनों ने एक दूसरे के मन का हरण कर लिया है। इसलिए दोनों की दृष्टि कहीं और नहीं जाती। [2]
इनके मन से मन मिले हुए हैं, वचन मृदु हैं, मन को मोहने वाले हैं, नयन की क्रिया परस्पर अवलोकन की है। नेत्रों से ही रूप रस का पान हो रहा है। रूप अंग संग के आस्वादन से उनके मन बड़े थकित हो गए हैं। घन दामिनी जिस प्रकार हमेंशा साथ रहते हैं, उसी प्रकार ये दोनों सर्वदा साथ रहते हैं। यह कभी बिछुड़ते नहीं, अलग नहीं होते। गौर वरन में श्याम वरन बसे हुए हैं। जहाँ-जहाँ इनका मन अटका है, वहाँ के वे बन गये। [3]
हरिदासी जी स्वामी श्यामा कुंजबिहारी दोनों कुंजो में अटल रूप से बिहार करते हैं, कभी टलना नहीं चाहते। [4]