रजधानी वृंदाविपिन - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

रजधानी वृंदाविपिन - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

रजधानी वृंदाविपिन, बय किसोर जुगराज।
करैं सहचरी नित नए, काम केलि के साज॥

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

वृन्दावन धाम नित्य-दम्पति श्री राधा–कृष्ण की राजधानी है, जहाँ सहचारियाँ उनकी ‘केलि-लीलाओं’ से सम्बन्धित विविध सेवाओं का संपादन करती रहती हैं।