(राग गौरी)
श्री निधिवनराज की जै रहियै।
जामें नित्य बिहार निरंतर काम कहानी कहियै॥ [1]
श्रीहरिदास सहायक अँग सँग और कहा हमें चहियै।
श्रीकुंजबिहारिनि प्रान पियारी उमँगि उमँगि दुलरैये॥ [2]
- श्री ललितकिशोरी देव जू, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (40)
श्री ललितकिशोरी देव जी निज आश्रितजनों को आज्ञा करते हुये कह रहे हैं "हे भाई! निधिवनराज का सदैव जय-जयकार करते रहो, जहाँ श्री युगल का निरंतर नित्य विहार होता है, वहाँ बैठ कर श्री युगल की प्रेम-रसमय विलास की परस्पर चर्चा किया करो। [1]
श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज सदैव ऐसे जनों के अंग-संग रहते हैं, फिर तुम्हें किसी और बात की आवश्यकता नहिं रह जाएगी। श्री कुंज बिहरिनी प्राण प्यारी श्री राधारानी को नये नये भावों से दुलार करो। [2]
श्री निधिवनराज की जै रहियै।
जामें नित्य बिहार निरंतर काम कहानी कहियै॥ [1]
श्रीहरिदास सहायक अँग सँग और कहा हमें चहियै।
श्रीकुंजबिहारिनि प्रान पियारी उमँगि उमँगि दुलरैये॥ [2]
- श्री ललितकिशोरी देव जू, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (40)
श्री ललितकिशोरी देव जी निज आश्रितजनों को आज्ञा करते हुये कह रहे हैं "हे भाई! निधिवनराज का सदैव जय-जयकार करते रहो, जहाँ श्री युगल का निरंतर नित्य विहार होता है, वहाँ बैठ कर श्री युगल की प्रेम-रसमय विलास की परस्पर चर्चा किया करो। [1]
श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज सदैव ऐसे जनों के अंग-संग रहते हैं, फिर तुम्हें किसी और बात की आवश्यकता नहिं रह जाएगी। श्री कुंज बिहरिनी प्राण प्यारी श्री राधारानी को नये नये भावों से दुलार करो। [2]

