आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (10)

आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (10)

(राग सारंग व राग बिलावल)
आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर,
कहा कहौं, अंग अंग परम माधुरी। [1]
करत केलि कंठ मेलि बाहु दंड गंड-गंड,
परस, सरस रास लास मंडली जुरी॥ [2]
स्याम-सुंदरी विहार, बाँसुरी मृदंग तार,
मधुर घोष नूपुरादि किंकनी चुरी। [3]
(जै श्री) देखत हरिवंश आलि, निर्त्तनी सुधंग चलि,
वारि फेरि देत प्राँन देह सौं दुरी॥ [4]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (10)


आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है। [1]
सहचरि परिकर में अनुराग विवश युगल, परस्पर स्कन्ध वाहु परिवेष्टित, कपोल का स्पर्श किये हुए सरस रास लास्य का विस्तार करते हैं। [2]
सुन्दर श्यामा-श्याम के रास विहार में वंशी मृदंग और तार वाद्यों का मधुर घोष क्षरित है एवं श्रीअंग पर धारण नूपुर किंकिणी वलयादि आभूषणों का मधुर सिंजन स्वर सम्मिलित है। [3]
नृत्यगति शीला श्रीराधा की तीव्र नृत्य गति को देखकर स्वामिनी की अंग भूता रस विमुग्धा हित अलि अपने प्राणों को बारम्बार न्यौछावर करती हैं। [4]