वृन्दावनमनुविन्दाम्यहमपि देहं श्वशूकरादीनाम्।
न पुनः परत्र सच्चित् सुखमयमपि॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.53)
श्रीवृन्दावन के कूकर शूकरादि का शरीर भी मैं धारण करूँगा, किन्तु और जगह देवताओं के लिए भी दुर्लभ सच्चिदानन्दमय शरीर को मैं नहीं चाहता।
न पुनः परत्र सच्चित् सुखमयमपि॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.53)
श्रीवृन्दावन के कूकर शूकरादि का शरीर भी मैं धारण करूँगा, किन्तु और जगह देवताओं के लिए भी दुर्लभ सच्चिदानन्दमय शरीर को मैं नहीं चाहता।

