(राग सारंग)
राधिका मोहन की प्यारी। [1]
नखसिख रूप अनूप गुन सीमा, नागरि श्रीवृषभानदुलारी॥ [2]
वृंदाविपिन निकुंजभवन तन कोटिचंद उजियारी। [3]
नव नव प्रीति प्रतीति रीति रस वस किये कुंजविहारी॥ [4]
सुभग सुहाग प्रेमरँग राची, अँग अँग श्याम सिंगारी। [5]
व्यास स्वामिनी के पदनख पर,वलि वलिजात रसिक नरनारी॥ [6]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (79)
श्री राधा श्रीकृष्ण को प्राणों से भी प्यारी हैं। (1)
नख से शिख तक, वे सुंदरता और गुणों की सीमा हैं, जो महाराज वृषभानु की लाड़िली हैं। (2)
निकुंज महल में श्री किशोरी जी की रूप माधुर्य की छटा की चमक, करोड़ों चंद्रमाओं को परास्त कर रही है। (3)
श्री प्यारीजू ने कुंज बिहारी (श्री कृष्ण) को अपने दिव्य प्रेम के नित्य नवीन भावों से अपने वश कर रखा है। (4)
उनकी मांग में सिंदूर शोभनीय है, स्वयं वह दिव्य प्रेम के रंगों में लीन, वे अपने प्रियतम को सुख पहुँचाने के लिए सोलह प्रकार के श्रंगार से अलंकृत हैं, जिससे श्री बिहारिनि जू की सुंदरता का वर्णन असंभव हो रहा है। (5)
श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "समस्त रसिक भक्त श्री किशोरी जू के चरण कमलों के नख-पद पर स्वयं को न्योछावर करते हैं"। (6)
राधिका मोहन की प्यारी। [1]
नखसिख रूप अनूप गुन सीमा, नागरि श्रीवृषभानदुलारी॥ [2]
वृंदाविपिन निकुंजभवन तन कोटिचंद उजियारी। [3]
नव नव प्रीति प्रतीति रीति रस वस किये कुंजविहारी॥ [4]
सुभग सुहाग प्रेमरँग राची, अँग अँग श्याम सिंगारी। [5]
व्यास स्वामिनी के पदनख पर,वलि वलिजात रसिक नरनारी॥ [6]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (79)
श्री राधा श्रीकृष्ण को प्राणों से भी प्यारी हैं। (1)
नख से शिख तक, वे सुंदरता और गुणों की सीमा हैं, जो महाराज वृषभानु की लाड़िली हैं। (2)
निकुंज महल में श्री किशोरी जी की रूप माधुर्य की छटा की चमक, करोड़ों चंद्रमाओं को परास्त कर रही है। (3)
श्री प्यारीजू ने कुंज बिहारी (श्री कृष्ण) को अपने दिव्य प्रेम के नित्य नवीन भावों से अपने वश कर रखा है। (4)
उनकी मांग में सिंदूर शोभनीय है, स्वयं वह दिव्य प्रेम के रंगों में लीन, वे अपने प्रियतम को सुख पहुँचाने के लिए सोलह प्रकार के श्रंगार से अलंकृत हैं, जिससे श्री बिहारिनि जू की सुंदरता का वर्णन असंभव हो रहा है। (5)
श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "समस्त रसिक भक्त श्री किशोरी जू के चरण कमलों के नख-पद पर स्वयं को न्योछावर करते हैं"। (6)

