(दोहा)
अंग अंग रस वृष्टि करि, पुष्ट परसि पद भाल।
चलत प्रान प्रतिपाल कै, सनमुख रुख लियें लाल॥
(पद)
सनमुख रुख लियें ललन चलत नव बाल कें। [1]
एक आज्ञाहिं अनुकूल आनन्द उर,
रहत ज्यों चहत त्यों प्रान प्रतिपाल कें॥ [2]
दृष्टि-रस-वृष्टि करि पुष्ट अंग अंग सकल,
सुष्ट संतुष्ट पद परसि निज भाल कें। [3]
श्रीहरिप्रिया सहज सुख सुखी सेवत,
सुरत जुरत जिय में न इतनी धनी लाल कें॥ [4]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत-सुख (4)
(दोहा)
श्रीस्वामिनीजी के अंग-प्रत्यंग से होने वाली रस-वर्षा ने श्रीलालजू के प्रत्येक अंग को पुष्ट कर दिया है; वे रस-पिपासु होकर अत्यंत अधीनता के साथ अपना मस्तक उनके चरण-कमलों पर स्पर्श कराने लगे। तत्पश्चात्, लालजू अपनी प्राण-जीवन-धन श्रीप्रियाजी के रुख (संकेत) को पहचान कर विहार में प्रवृत्त हुए।
(पद)
श्रीलालजू एक मात्र श्रीप्रियाजू के रुख देख कर ही विहार में प्रवर्त होते हैं। [1]
उनके ह्रदय का आनन्द उनकी प्राण जीवन धन श्रीस्वामिनी जी की एक मात्र आज्ञा पालन करने में ही है। [2]
ज्योंही श्रीप्रिया जी ने रस-भरी दृष्टि से लाल जी की ओर देखा, त्योंही श्रीलालजू के अंग प्रत्यंग पुष्ट हो गये। और लालजू सुष्ट प्रकार से संतुष्ट हो कर श्री स्वामिनी जी के चरणार विन्दों को अपने मस्तक से स्पर्श कराने लगे। [3]
धनीलाल अर्थात् श्रीप्रिया प्रीतम के जिसमें मैंन की इतनी अधिकता हुई कि वह सहज अर्थात् स्वाभाविक सुख का सेवन करते हुए सुरत सुख में प्रवर्त हो गये अर्थात् महा मन्मथ की उपासना करने लगे। [4]
अंग अंग रस वृष्टि करि, पुष्ट परसि पद भाल।
चलत प्रान प्रतिपाल कै, सनमुख रुख लियें लाल॥
(पद)
सनमुख रुख लियें ललन चलत नव बाल कें। [1]
एक आज्ञाहिं अनुकूल आनन्द उर,
रहत ज्यों चहत त्यों प्रान प्रतिपाल कें॥ [2]
दृष्टि-रस-वृष्टि करि पुष्ट अंग अंग सकल,
सुष्ट संतुष्ट पद परसि निज भाल कें। [3]
श्रीहरिप्रिया सहज सुख सुखी सेवत,
सुरत जुरत जिय में न इतनी धनी लाल कें॥ [4]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत-सुख (4)
(दोहा)
श्रीस्वामिनीजी के अंग-प्रत्यंग से होने वाली रस-वर्षा ने श्रीलालजू के प्रत्येक अंग को पुष्ट कर दिया है; वे रस-पिपासु होकर अत्यंत अधीनता के साथ अपना मस्तक उनके चरण-कमलों पर स्पर्श कराने लगे। तत्पश्चात्, लालजू अपनी प्राण-जीवन-धन श्रीप्रियाजी के रुख (संकेत) को पहचान कर विहार में प्रवृत्त हुए।
(पद)
श्रीलालजू एक मात्र श्रीप्रियाजू के रुख देख कर ही विहार में प्रवर्त होते हैं। [1]
उनके ह्रदय का आनन्द उनकी प्राण जीवन धन श्रीस्वामिनी जी की एक मात्र आज्ञा पालन करने में ही है। [2]
ज्योंही श्रीप्रिया जी ने रस-भरी दृष्टि से लाल जी की ओर देखा, त्योंही श्रीलालजू के अंग प्रत्यंग पुष्ट हो गये। और लालजू सुष्ट प्रकार से संतुष्ट हो कर श्री स्वामिनी जी के चरणार विन्दों को अपने मस्तक से स्पर्श कराने लगे। [3]
धनीलाल अर्थात् श्रीप्रिया प्रीतम के जिसमें मैंन की इतनी अधिकता हुई कि वह सहज अर्थात् स्वाभाविक सुख का सेवन करते हुए सुरत सुख में प्रवर्त हो गये अर्थात् महा मन्मथ की उपासना करने लगे। [4]

