श्री प्रभोदनन्द सरस्वती जी ने लिखे अपने ग्रन्थ वृन्दावन महिमामृत में एक अद्भुत मन्त्र की महिमा बताई है, जिसे गुप्त रखा गया है।
“मन्त्रं ह्यस्या अखिल निगमागम्यमेव ब्रवीमि यत् प्राकट्यं क्वचिदपि कृतं नो रहस्यागमेषु। पादप्रान्ते विलुठति महासिद्धिसंघोऽर्नजप्तुः श्रीमद्भावा अपि भगवतो यत्प्रभावत् करस्थाः”।।15.73।।
उसका मन्त्र भी समस्त शास्त्रों से अगम्य है, तो भी मैं उसे कहता हूं, जिसके प्राकट्य का निगूढ़ विषय शास्त्रों में कहीं भी नहीं कहा गया है, (जो इस मन्त्र का जप करता है) उसके चरणों में महासिद्धियां लोटती हैं। एवं श्रीभगवान के सुन्दर सुन्दर भाव समूह उसके प्रभाव से मानो करतलों में आ जाते हैं।
“नित्यं यज्जपिनि ननु जने नो विधिर्नो नियेध स्तत्पादाम्भोरुह युगरजो वेद तज्ज्ञान पुनाति। यत् पीयूषाद्यति सुमधुरं मंगलं मंगलानां सर्वाश्चर्यामित महिम यत् साधकं साधकानाम्”।।15.74।।
उस मन्त्र का जो नित्य ही जप करता है उसके लिये कोई भी विधि निषेध नहीं है, क्योंकि उसके पादपद्मद्वय का रजकण वेद एवं वेदज्ञगणों को पवित्र करने वाला है, जो अमृतादि से भी अति सुमधुर है, मंगलों का भी मंगलकारी है एवं साधकों के लिये सर्वाश्चर्यमय असीम महिमा युक्त साधन है।
“साध्यानां यत्परम परमं साध्यमत्युन्मदाना मानन्दानामपि च परम प्रोन्मदानन्दमाहुः। सर्वासां यत् परम सुरहस्यावलीनां रहस्यं (धारेत्येव) राधेत्येवं जप तदनिश सार्थसंस्मृत्यनन्य”।।15.75।।
साध्य वस्तुओं का भी वह अति परमसाध्य है, अत्युन्मद आनन्दराशि का भी परम मत्तताजनक आनन्द उसे कहा गया है, परम रहस्यों का भी वह अति रहस्य है वह मन्त्र-“राधा” नाम है। इसका अर्थ जाने बिना दिन रात इस मन्त्र का अनन्य भाव से जपकर।।75।।
सा पीयूषादिक मधित सन्माधुरी सार धारा प्रेमानन्दोन्मद रस चमत्कार सर्वस्व धारा। अस्माकं वा सुभग तव वा वेद कोऽन्यस्य वा स्यात् कस्याप्येषा परम हृदयोल्लासि धारेत्यदोऽर्थः।।15.76।।
यह अमृतादि के मन्थन से उत्पन्न हुई उत्कृष्ट माधुर्य-सार की धारा है, प्रेमानन्द उन्मद रस चमत्कार की सर्वस्व धारा है, कौन जानता है कि यह हमारी, अथवा सौभाग्यशाली तुम्हारी अथवा किसी और की भी परमोल्लासमयी धारा है! यही इस मन्त्र का अर्थ है।।76।।

