(राग कल्यान)
जौलौं जीवै तौलौं हरि भज रे मन और बात सब बादि। [1]
द्यौस चार के हला-भला में कहा लेइगौ लादि? [2]
माया-मद, गुन-मद, जोवन-मद भूल्यौ नगर विवादि। [3]
कहिं श्रीहरिदास लोभ चरपट भयौ, काहे की लगै फ़िरादि॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पद (17)
इस पद में स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज समस्त जीवों को उपदेश देते हुए कहते हैं, “हे भाई! जब तक तू इस जगत में जीवित है, सब प्रकार के सांसारिक झंझटों को त्यागकर, केवल श्रीहरि का भजन कर।” [1]
तू जगत की थोड़े दिन की भलाई-बुराई और वाह-वाही से परलोक में क्या ले जा सकता है? इन सांसारिक सराहनाओं का वहाँ कोई महत्व नहीं है। [2]
तू नगर के विवाद, नश्वर धन, गुण और यौवन के मद में डूबकर साक्षात् करुणा और दया के समुद्र, श्रीहरि के नाम का स्मरण करना भूल गया है, जो अद्वितीय सुख का स्रोत है। [3]
स्वामी हरिदासजी महाराज अंत में कहते हैं कि जीवों की मन-बुद्धि में लोभ इस प्रकार घर कर चुका है कि किसी संत, महात्मा या भगवान का उपदेश भी उनके हृदय में प्रविष्ट नहीं हो पाता। वे सच्चे मार्ग को पहचान नहीं पाते। [4]
जौलौं जीवै तौलौं हरि भज रे मन और बात सब बादि। [1]
द्यौस चार के हला-भला में कहा लेइगौ लादि? [2]
माया-मद, गुन-मद, जोवन-मद भूल्यौ नगर विवादि। [3]
कहिं श्रीहरिदास लोभ चरपट भयौ, काहे की लगै फ़िरादि॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पद (17)
इस पद में स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज समस्त जीवों को उपदेश देते हुए कहते हैं, “हे भाई! जब तक तू इस जगत में जीवित है, सब प्रकार के सांसारिक झंझटों को त्यागकर, केवल श्रीहरि का भजन कर।” [1]
तू जगत की थोड़े दिन की भलाई-बुराई और वाह-वाही से परलोक में क्या ले जा सकता है? इन सांसारिक सराहनाओं का वहाँ कोई महत्व नहीं है। [2]
तू नगर के विवाद, नश्वर धन, गुण और यौवन के मद में डूबकर साक्षात् करुणा और दया के समुद्र, श्रीहरि के नाम का स्मरण करना भूल गया है, जो अद्वितीय सुख का स्रोत है। [3]
स्वामी हरिदासजी महाराज अंत में कहते हैं कि जीवों की मन-बुद्धि में लोभ इस प्रकार घर कर चुका है कि किसी संत, महात्मा या भगवान का उपदेश भी उनके हृदय में प्रविष्ट नहीं हो पाता। वे सच्चे मार्ग को पहचान नहीं पाते। [4]

