रसिक अनन्य कहाइकैं, पूजैं ग्रह गन्नेस।
व्यास क्यौं न तिनके सदन, जम गन करैं प्रवेस॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धान्त की साखी (101)
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जो स्वयं को 'रसिक-अनन्य' (श्री राधा-कृष्ण के अनन्य भक्त) कहलाते हैं, परंतु फिर भी सांसारिक लाभ के लिए नवग्रहों और गणेश आदि अन्य देवताओं की पूजा में लगे रहते हैं, उनकी अनन्यता खंडित है। व्यास जी प्रश्न करते हैं कि ऐसे लोगों के घर में यमराज के दूत प्रवेश क्यों नहीं करेंगे? अर्थात, बिना पूर्ण शरणागति और अनन्य निष्ठा के जीव जन्म-मृत्यु के चक्र और यम-दंड से मुक्त नहीं हो सकता।
व्यास क्यौं न तिनके सदन, जम गन करैं प्रवेस॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धान्त की साखी (101)
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जो स्वयं को 'रसिक-अनन्य' (श्री राधा-कृष्ण के अनन्य भक्त) कहलाते हैं, परंतु फिर भी सांसारिक लाभ के लिए नवग्रहों और गणेश आदि अन्य देवताओं की पूजा में लगे रहते हैं, उनकी अनन्यता खंडित है। व्यास जी प्रश्न करते हैं कि ऐसे लोगों के घर में यमराज के दूत प्रवेश क्यों नहीं करेंगे? अर्थात, बिना पूर्ण शरणागति और अनन्य निष्ठा के जीव जन्म-मृत्यु के चक्र और यम-दंड से मुक्त नहीं हो सकता।

