राधे तेरे प्रेम की कापै कहि आवे - श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (29)

राधे तेरे प्रेम की कापै कहि आवे - श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (29)

(दोहा)
मन बच कर्म दुर्गम सदा, ताहि व चरण छुबात ।
राधे तेरे प्रेम की, कहि आवत नहिं बात॥


(पद)
(राग बिलावल, एकताल)
राधे तेरे प्रेम की कापै कहि आवे।
तेरीसी गोपाल सौं, तो पै बनि आवै॥ [1]
मन बच क्रम दुर्गम किशोर, ताहि चरण छुड़ावै।
'श्री भट्ट' मति वृष भानु जे, प्रताप जनाबे॥ [2]

- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (29)

(दोहा)
हे श्रीराधे! जिनका साक्षात् दर्शन मन, वाणी और कर्मों के द्वारा भी सम्भव नहीं है और जो सर्वथा अगम्य एवं दुर्लभ हैं, वही सबके प्रियतम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे श्रीचरणों में अपना शीश नवाते हैं। हे राधे! तुम्हारे अलौकिक प्रेम की महिमा वास्तव में विलक्षण है, जिसका वर्णन करना शब्दों की सीमा से परे है।

(पद)
यहाँ श्री श्रीभट्ट देवाचार्य जी सखियों के माध्यम से परम प्रेमा श्री वृषभानुजा श्री राधा के परम प्रभाव का वृतान्त व्यक्त कर रहे है।
हे राधे, तेरे परम प्रेम प्रभाव को यथार्थतः कोई नहीं कह सकता। तुमने प्रियतम से मान ठान लिया है और प्रियतम गोपाल तुझको मनाने के लिए आये है। [1]
श्री गोपाल से ऐसा मान तुझसे ही बन सकता है क्योंकि मन वच कर्म से दुर्गम किशोर स्वयं लीला स्वरूप धारण करके तुम्हारे प्रेम भाव के अधीन होकर तेरे चरण छू रहे हैं अर्थात तेरी मनुहार कर रहे है। श्री राधे ! ऐसा प्रेमप्रताप तेरा ही हो सकता है। [2]