यावद्राधापदनखमणि चन्द्रिका नाविरास्ते तावद् वृन्दावनभुवि मुदं नैति चेतश्चकोरी।
यावद वृन्दावनभुवि भवेन्नापि निष्ठा गरिष्ठा तावत् राधाचरणकरुणा नैव तादृश्युदेति॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (13.2)
जब तक श्रीराधा के पद नख की चन्द्रिका श्रीवृन्दावन-भूमि पर आविर्भूत नहीं होती, तब तक चकोर रूपी चित्त को आनन्द नहीं प्राप्त होता, और जब तक श्रीवृन्दावन-भूमि में पूर्ण निष्ठा नहीं होती, तब तक श्रीराधा चरण की कृपा भी पूर्ण रीति से उदित नहीं हो पाती।
यावद वृन्दावनभुवि भवेन्नापि निष्ठा गरिष्ठा तावत् राधाचरणकरुणा नैव तादृश्युदेति॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (13.2)
जब तक श्रीराधा के पद नख की चन्द्रिका श्रीवृन्दावन-भूमि पर आविर्भूत नहीं होती, तब तक चकोर रूपी चित्त को आनन्द नहीं प्राप्त होता, और जब तक श्रीवृन्दावन-भूमि में पूर्ण निष्ठा नहीं होती, तब तक श्रीराधा चरण की कृपा भी पूर्ण रीति से उदित नहीं हो पाती।

