यत्किंकरीषु बहुशः खलु काकुवाणी नित्यं परस्य पुरुषस्य शिखण्डमौलेः।
तस्याः कदा रसनिधेर्वृषभानुजायास्तत्केलिकुञ्ज भावनांगण मार्जनिस्याम्॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (7)
निश्चय ही; जिनकी दासियों से परम-पुरुष शिखण्ड-मौली श्रीश्यामसुन्दर नित्य-निरन्तर कातर-वाणी द्वारा भूरी-भूरी प्रार्थना करते रहते हैं, क्या मैं कभी उन रसनिधि श्रीवृषभानुजा के केलि-कुञ्ज-भवन के प्रांगण की सोहनी देने वाली हो सकूँगी ? (जिसमें प्रवेश करने के लिए श्रीलालजी को भी सखियों से प्रार्थना करनी पड़ती है)।
तस्याः कदा रसनिधेर्वृषभानुजायास्तत्केलिकुञ्ज भावनांगण मार्जनिस्याम्॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (7)
निश्चय ही; जिनकी दासियों से परम-पुरुष शिखण्ड-मौली श्रीश्यामसुन्दर नित्य-निरन्तर कातर-वाणी द्वारा भूरी-भूरी प्रार्थना करते रहते हैं, क्या मैं कभी उन रसनिधि श्रीवृषभानुजा के केलि-कुञ्ज-भवन के प्रांगण की सोहनी देने वाली हो सकूँगी ? (जिसमें प्रवेश करने के लिए श्रीलालजी को भी सखियों से प्रार्थना करनी पड़ती है)।

