सखी सबै उडगन मनौं, एक बार आनंद। पिय चकोर 'ध्रुव' छकि रहे, निरखि कुँवरि मुखचंद॥ [1]
ऐसी अद्भुत सभा बनी, इक छत सुख की रासि। फूले फूल आनंद के, सहज परस्पर हाँसि॥ [2]
देखि लाल के लालचहि, लालच हू ललचाइ। नवल कटाक्ष तरंग रस, पीवतहू न अघाइ॥ [3]
एकहि वय गुन प्रेम रस, रूपऽरू सील सुभाव। अद्भुत जोरी बनी ध्रुव, देखि बढ़त चित-चाव॥ [4]
या रस के जे रसिकजन, तिनकी कौन समान। बिना मधुर रस-माधुरी, परसत नहिं कछु आन॥ [5]
रसिक तबहिं पहिचानियै जाकैं यह रस-रीति। छिन-छिन हिय में झलकि रहै, लाल लाड़िली प्रीति॥ [6]
यह रस जिन समुझ्यौ नहिं, ताके ढिंग जिनि जाहु। तजि सतसंग सुधा रसहि, सिंधु-सुतहि जिनि खाहु॥ [7]
वृन्दावन-रस अति सरस, कैसैं करौं बखान। जिहि आगैं बैकुंठ कौ, फीकौ लगतु पयान॥ [8]
यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जौ, संध्या और सबार। ताके हियैं प्रकास रहै, मिटै त्रिगुन-अँधियार॥ [9]
- श्रीध्रुवदास जी, बयालीस लीला, आनंदाष्टक लीला
श्री वृंदावन नित्य विहार के नित्य नव निभृत निकुञ्ज विलासी चतुर्व्यूह परिकर का संक्षिप्त परिचयात्मक रूपक प्रस्तुत करते हुए श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि आनंद धाम श्रीवृंदावन ही मानो एक निरभ्र, प्रेमाकाश है। जहाँ सखियों का समुदाय ही देदीप्यमान तारा मण्डल है। जिसके मध्य में नवल किशोरी निकुञ्जेश्वरी श्रीराधा का छवि-धाम मुख्य मण्डल अलौकिक चन्द्रमा की भाँति जगमगा रहा है। प्रियतम श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के रूप पिपासु नेत्र चकोर हैं, जो निर्निमेष भाव से प्रियतमा की मुख चंद्र माधुरी का पान करके छके रहते हैं। [1]
वृंदावन प्रांगण में सखी जन एवं प्रिया प्रियतम कि यह मंडली अद्भुत तो है ही, विलक्षण एवं एकछत्र सुख की राशि भी है, जहाँ परिकर का परस्पर हास्य ही आनंद रूपी पुष्पों का विकास है। [2]
श्रीकिशोरी के विशाल नेत्रों की नव-नव कटाक्ष तरंगों का अनवरत रसपान करते हुए भी प्रियतम का रूप-लालची मन तृप्त नहीं होता है। श्रीलाल जी के रूप-दर्शन लालच को देखकर ऐसा लगता है कि मूर्तिमान लालच भी लाल जी के लालच को देखकर ललचा रहा है। [3]
युगल किशोर की वय (आयु), गुणावली, पारस्परिक विलास, प्रेम, नवनवायमान् रूप, शील, नम्रता, मृदुता युक्त स्वभाव, सभी कुछ समान हैं। ऐसी अद्भुत मिथुन-मूर्ति को देख कर देखते रहने का ही चाव चढ़ता रहता है। [4]
वृंदावन नित्य विहार परिकर के नाम, रूप, लीला, रसास्वादी रसिक जनों की समता कौन कर सकता है, जो इस मधुर रस की माधुरी के सिवाय अन्य किसी रस का स्पर्श भी नहीं करते। [5]
यदि भक्तों का आस्वादनिय इष्ट तत्व यह रस-रीति है एवं क्षण-क्षण प्रति उनके ह्रदय में ललित लाडिली-लाल की प्रीति झलकती-हिलोरें लेती रहती है, वास्तव में तभी उन्हें रसिक जानना और मानना चाहिए। [6]
जिन्होंने उपरिकथित वृंदावन निकुंज-विलास रस को जाना-पहचाना तक नहीं है, रसिक उपासक को उनके समीप जाना तक उचित नहीं है, अर्थात उनसे संपर्क स्थापित करना विष-भक्षण तुल्य है, अतएव रसिक उपासक को चाहिए कि रसिक संग रूपी अमृत का त्याग करके अन्य किसी के संग रूपी सिंधु-पुत्र विष का भक्षण न करे। [7]
वृंदावन-रस अत्यंत ही सरस है, जिसका वर्णन करने में वाणी असमर्थ है। जिस वृंदावन के समक्ष वैकुंठ का प्रस्थान भी तुच्छ प्रतीत होता है। [8]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जो दिन में दो बार सुबह और शाम, "आनंदाष्टक" का पाठ करेगा, उसके ह्रदय से माया का अँधकार मिट जायेगा और प्रेम का प्रकश होगा । [9]
ऐसी अद्भुत सभा बनी, इक छत सुख की रासि। फूले फूल आनंद के, सहज परस्पर हाँसि॥ [2]
देखि लाल के लालचहि, लालच हू ललचाइ। नवल कटाक्ष तरंग रस, पीवतहू न अघाइ॥ [3]
एकहि वय गुन प्रेम रस, रूपऽरू सील सुभाव। अद्भुत जोरी बनी ध्रुव, देखि बढ़त चित-चाव॥ [4]
या रस के जे रसिकजन, तिनकी कौन समान। बिना मधुर रस-माधुरी, परसत नहिं कछु आन॥ [5]
रसिक तबहिं पहिचानियै जाकैं यह रस-रीति। छिन-छिन हिय में झलकि रहै, लाल लाड़िली प्रीति॥ [6]
यह रस जिन समुझ्यौ नहिं, ताके ढिंग जिनि जाहु। तजि सतसंग सुधा रसहि, सिंधु-सुतहि जिनि खाहु॥ [7]
वृन्दावन-रस अति सरस, कैसैं करौं बखान। जिहि आगैं बैकुंठ कौ, फीकौ लगतु पयान॥ [8]
यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जौ, संध्या और सबार। ताके हियैं प्रकास रहै, मिटै त्रिगुन-अँधियार॥ [9]
- श्रीध्रुवदास जी, बयालीस लीला, आनंदाष्टक लीला
श्री वृंदावन नित्य विहार के नित्य नव निभृत निकुञ्ज विलासी चतुर्व्यूह परिकर का संक्षिप्त परिचयात्मक रूपक प्रस्तुत करते हुए श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि आनंद धाम श्रीवृंदावन ही मानो एक निरभ्र, प्रेमाकाश है। जहाँ सखियों का समुदाय ही देदीप्यमान तारा मण्डल है। जिसके मध्य में नवल किशोरी निकुञ्जेश्वरी श्रीराधा का छवि-धाम मुख्य मण्डल अलौकिक चन्द्रमा की भाँति जगमगा रहा है। प्रियतम श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के रूप पिपासु नेत्र चकोर हैं, जो निर्निमेष भाव से प्रियतमा की मुख चंद्र माधुरी का पान करके छके रहते हैं। [1]
वृंदावन प्रांगण में सखी जन एवं प्रिया प्रियतम कि यह मंडली अद्भुत तो है ही, विलक्षण एवं एकछत्र सुख की राशि भी है, जहाँ परिकर का परस्पर हास्य ही आनंद रूपी पुष्पों का विकास है। [2]
श्रीकिशोरी के विशाल नेत्रों की नव-नव कटाक्ष तरंगों का अनवरत रसपान करते हुए भी प्रियतम का रूप-लालची मन तृप्त नहीं होता है। श्रीलाल जी के रूप-दर्शन लालच को देखकर ऐसा लगता है कि मूर्तिमान लालच भी लाल जी के लालच को देखकर ललचा रहा है। [3]
युगल किशोर की वय (आयु), गुणावली, पारस्परिक विलास, प्रेम, नवनवायमान् रूप, शील, नम्रता, मृदुता युक्त स्वभाव, सभी कुछ समान हैं। ऐसी अद्भुत मिथुन-मूर्ति को देख कर देखते रहने का ही चाव चढ़ता रहता है। [4]
वृंदावन नित्य विहार परिकर के नाम, रूप, लीला, रसास्वादी रसिक जनों की समता कौन कर सकता है, जो इस मधुर रस की माधुरी के सिवाय अन्य किसी रस का स्पर्श भी नहीं करते। [5]
यदि भक्तों का आस्वादनिय इष्ट तत्व यह रस-रीति है एवं क्षण-क्षण प्रति उनके ह्रदय में ललित लाडिली-लाल की प्रीति झलकती-हिलोरें लेती रहती है, वास्तव में तभी उन्हें रसिक जानना और मानना चाहिए। [6]
जिन्होंने उपरिकथित वृंदावन निकुंज-विलास रस को जाना-पहचाना तक नहीं है, रसिक उपासक को उनके समीप जाना तक उचित नहीं है, अर्थात उनसे संपर्क स्थापित करना विष-भक्षण तुल्य है, अतएव रसिक उपासक को चाहिए कि रसिक संग रूपी अमृत का त्याग करके अन्य किसी के संग रूपी सिंधु-पुत्र विष का भक्षण न करे। [7]
वृंदावन-रस अत्यंत ही सरस है, जिसका वर्णन करने में वाणी असमर्थ है। जिस वृंदावन के समक्ष वैकुंठ का प्रस्थान भी तुच्छ प्रतीत होता है। [8]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जो दिन में दो बार सुबह और शाम, "आनंदाष्टक" का पाठ करेगा, उसके ह्रदय से माया का अँधकार मिट जायेगा और प्रेम का प्रकश होगा । [9]

