मेरे प्रान धन स्वामिनि स्याम राधे - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.7)

मेरे प्रान धन स्वामिनि स्याम राधे - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.7)

मेरे प्रान धन स्वामिनि स्याम राधे। [1]
एक रस रूप सम वैस बारिज बदन छके रहें प्रेम यह नेम साधे॥ [2]
करत केलि बिपरीत परस्पर विछुर नहिं जात कहुं पलक आधे। [3]
नैन की सैंन बरबैन भगवत रसिक देत सुख लेत सहचरि अगाधे॥ [4]

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.7)

मेरे जीवन के प्राण धन एक मात्र दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण हैं। (1)
वे दोनों एक ही रस में लीन हैं, दोनों के रूप और आयु भी एक समान है, दोनों ही प्रेम रस में छके हैं और एक-दूसरे के नए-नए भाव सौंदर्य से मुग्ध हैं। (2)
वे दोनों वृंदावन में नित्य केली लीला परायण हैं, जिसमें आधे पल के लिए भी कोई बिछोह नहीं है। (3)
श्री भगवत रसिक अपने सहचरी (श्री राधा की सखी) के रूप में कहतीं हैं "वह अपनी आँखों के माध्यम से दिव्य दम्पत्ति की रूप माधुरी को निहारती रहतीं हैं और दंपति भी उनपर स्नेह की वर्षा करते हैं और उन्हें श्री जुगल किशोर का प्रेम रस निरवधि प्राप्त होता रहता है।" (4)