अनेक जन्म की भूल कों, छिन में देइ मिटाइ।
कुंजबिहारिनि लाडिली, जिनके सदा सहाइ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (270)
परम प्रवीण रसिक-शिरोमणि श्री कुञ्जबिहारिणी लाड़िली-जू जिसे अपना निज बना लेती हैं, उसकी वे समस्त प्रकार से रक्षा करती हैं। फिर किसी भी प्रकार से उसका हाथ नहीं छोड़तीं और उसके अनन्त जन्मों की भूलों को भी एक ही क्षण में मिटा देती हैं।
कुंजबिहारिनि लाडिली, जिनके सदा सहाइ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (270)
परम प्रवीण रसिक-शिरोमणि श्री कुञ्जबिहारिणी लाड़िली-जू जिसे अपना निज बना लेती हैं, उसकी वे समस्त प्रकार से रक्षा करती हैं। फिर किसी भी प्रकार से उसका हाथ नहीं छोड़तीं और उसके अनन्त जन्मों की भूलों को भी एक ही क्षण में मिटा देती हैं।

