तातैं भैया मेरी सौं कृष्ण-गुण संचु - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, स्फुट वाणी (8)

तातैं भैया मेरी सौं कृष्ण-गुण संचु - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, स्फुट वाणी (8)

तातैं भैया मेरी सौं कृष्ण-गुण संचु। [1]
कुत्सित वाद विकारहिं परधन सुनु सिख मन्द पर-तिय बंचु। [2]
मनिगन-पुंज व्रजपति छाँड़त हित हरिवंश कर गहि कंचु॥ [3]
पाये जान जगत में सब जन कपटी कुटिल कलियुग-टंचु। [4]
इहि-परलोक सकल सुख पावत, मेरी सौं कृष्ण-गुण संचु॥ [5]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, स्फुट वाणी (8)

श्री हित हरिवंश महाप्रभु कह रहें हैं "अरे मन्दमति! तुम व्यर्थ ही के घृणित वाद-विवाद में क्यों पड़े हो? दूसरों के साथ वाद-विवाद करने, पराये धन एवं पराई स्त्री से सदा बचते रहना चाहिये। हे भाई! तुझे मेरी शपथ. इन सबसे मन हटाकर श्री कृष्ण के गुणों का संचय कर। [1 & 2]
मणियों के पुंज तुल्य बल्कि उससे भी कोटि गुणित महामूल्यवान् परम निधि श्री कृष्ण को छोड़कर, धन-सम्पत्ति का संग्रह करना मानो काँच जेसी निरर्थक वस्तु का संग्रह करना है। [3]
तुम्हें इस बात का बोध नही है कि तुम्हें प्राप्त अर्थात् तुम से सम्बन्धित सभी लोग कलिमल ग्रसित हैं। वे व्यवहार तो अति आत्मीयता और प्रेम का करते हैं परन्तु उनके मन में कपटता और कुटिलता भरी हुई है। [4]
तू इस लोक और परलोक के समस्त सुखो को सहज रूप से ही प्राप्त कर लेगा, मेरी बात मान और श्री कृष्ण के मंगलमय गुणों का संचय कर, तुम्हें मेरी शपथ। श्री कृष्ण के नाम-रूप, लीला-चिंतन से तुम्हारा परलोक तो सुधरेगा ही, इसलोक में भी सुख-शान्ति-यश-धन-वैभव किसी प्रकार का अभाव नहीं रहेगा।" [5]