तेरे ही पुजारियों की पद धूरि, मैं नित्य ही शीश चढ़ाया करू।
तेरे भक्त की भक्ति करू मैं सदा, तेरे चाहने वालों को चाहा करू॥
- ब्रज के सेवैया
मेरी मनोवृत्ति ऐसी बना दो कि तुम्हारे प्रेमियों की चरण रज को नित्य अपने मस्तक पर चढाऊँ और तुम्हारे भक्तों की भक्ति किया करूँ। और तुमसे प्यार करने वालों को ही मैं चाहा करूँ।
तेरे भक्त की भक्ति करू मैं सदा, तेरे चाहने वालों को चाहा करू॥
- ब्रज के सेवैया
मेरी मनोवृत्ति ऐसी बना दो कि तुम्हारे प्रेमियों की चरण रज को नित्य अपने मस्तक पर चढाऊँ और तुम्हारे भक्तों की भक्ति किया करूँ। और तुमसे प्यार करने वालों को ही मैं चाहा करूँ।

