नैनन कौ लाठौ लीजिये - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (42)

नैनन कौ लाठौ लीजिये - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (42)

(दोहा)
कहत परस्पर सहचरी, उर में भरी उछाहु।
निरखि-निरखि सुख या समै, लैहु नैनन कौ लाहु॥


(पद)
नैनन कौ लाठौ लीजिये।
गोरी श्याम सलौनी जोरी सुरस माधुरी पीजिये॥ [1]
छिन-छिन प्रति प्रमुदित चित चावहि निज भावहि में भीजिये।
श्रीहरिप्रिया निरखि तन मन धन लै न्यौछावरि कीजिये॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (42)

(दोहा)
हृदयों में उमंगें भरी हुई सहचरियाँ परस्पर कह रही हैं, "इस समय इस युगल-रस के सुख को देखकर अपने नेत्रों का फल लीजिये।"

(पद)
"हे सखियों ! गोरी श्याम सलोनी जोरी की सुरस माधुरी को अपने नेत्र कमलों द्वारा पान कर करके इन नैनों का फल लीजिये। [1]

क्षण-क्षण में प्रसन्न हो-होकर अपने-चित्तों के चावों से अपने-अपने निज भावों में भीग जाएँ। श्रीहरि एवं प्रिया की इस समय की रूप माधुरी देख-देखकर अपने तन मन धन इन पर न्यौछावर कीजिये।" [2]