लडैती तेरी रीति महा सुखदाई - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (154)

लडैती तेरी रीति महा सुखदाई - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (154)

लडैती तेरी रीति महा सुखदाई।
जब तें धरी हिये में दृढ करि आनँद उर न समाई॥ [1]
कहाँ कहाँ लौं नित्य किसोरी तेरी कृपा कही नहिं जाई।
श्री हरिदासी रसिक सिरोंमनि हँसि हँसि कंठ लगाई॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (154)

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि हे प्रिया जू आपकी रीति अनंत सुख प्रदान करने वाली है। जब से मैंने अपने हृदय में दृढ़ करके इसे अपनाया है मेरे हृदय में अनंत आनंद है। [1]
हे नित्य किशोरी, मैं क्या कहूं, आपकी कृपा को कहने के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं हैं, एवं मैं आपकी कृपा को बताने में असमर्थ हूँ। रसिक शिरोमणि श्री हरिदास जी महाराज ने आपकी कृपा से ही हँस हँस के हमें कंठ लगाया है। [2]