तन्नः प्रतिक्षण चमत्कृत चारूलीला लावण्य मोहन महामधुराङ्गभङ्गि।
राधाननं हि मधुराङ्ग कलानिधानमाविर्भविष्यति कदा रससिन्धु सारम्॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (6)
जिस आनन-कमल से प्रतिक्षण महामोहन माधुर्य्य के विविध अङ्गों की भङ्गिमा युक्त सुन्दर-सुन्दर लीलाओं का लावण्य चमत्कृत होता रहता है और जो माधुर्य्य के अङ्गों की चातुरी का उत्पत्ति स्थान है, वही समस्त रस-सार-सिन्धु श्रीराधानन हमारे सम्मुख कब आविर्भूत होगा?
राधाननं हि मधुराङ्ग कलानिधानमाविर्भविष्यति कदा रससिन्धु सारम्॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (6)
जिस आनन-कमल से प्रतिक्षण महामोहन माधुर्य्य के विविध अङ्गों की भङ्गिमा युक्त सुन्दर-सुन्दर लीलाओं का लावण्य चमत्कृत होता रहता है और जो माधुर्य्य के अङ्गों की चातुरी का उत्पत्ति स्थान है, वही समस्त रस-सार-सिन्धु श्रीराधानन हमारे सम्मुख कब आविर्भूत होगा?

