(राग कल्याण)
जगत प्रीति करि देखी नाहिनें गटी कौ कोऊ। [1]
छत्रपति रंक लौं देखे प्रकृति बिरोध बन्यों नहिं कोऊ॥ [2]
दिन जो गये बहुत जनमनि के ऐसें जाउ जिनि कोऊ। [3]
कहें श्रीहरिदास मीत भले पाये बिहारी ऐसौ पावौ सब कोऊ॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पद (15)
प्रस्तुत पद में स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज संसार की नश्वरता और यहाँ के स्वार्थपरक अनुराग का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण करते हैं।
वे कहते हैं कि इस जगत में हमने परिजनों, मित्रों और संबंधियों—सभी से प्रीति का अनुभव किया, किंतु कोई भी आत्मा का वास्तविक हितैषी सिद्ध न हुआ। लेशमात्र त्रुटि होते ही संबंध छिन्न-भिन्न हो गए; यहाँ निस्वार्थ प्रेम का सर्वथा अभाव है। [1]
निर्धन से लेकर वैभवशाली छत्रपतियों तक की प्रीति का अवलोकन करने पर यही ज्ञात हुआ कि प्रत्येक जीव केवल अपने स्वभाव और इंद्रिय-सुख की वासना का दास है। जहाँ 'स्वसुख' की अभिलाषा प्रधान हो, वहाँ विशुद्ध प्रेम का लेशमात्र भी प्रवेश संभव नहीं है; अतः ये सभी उस पारमार्थिक रस से वंचित हैं। [2]
श्रीस्वामीजी महाराज अब श्रीहरि के चरणों में विनय करते हैं कि अनंत जन्मों से हमने इस असार संसार में अपना अनुराग व्यर्थ ही व्यय किया है। अब हमारी यह व्याकुल प्रार्थना है कि हमारा एक भी क्षण इस कपटपूर्ण और स्वार्थमयी प्रीति की भेंट न चढ़े। [3]
अंतिम चरण में वे हर्षित होकर कहते हैं कि अब हमें प्रेम-कला के चूड़ामणि और नित्य-विहार में नित्य निमग्न रहने वाले प्राणप्रिय श्रीबिहारीजी महाराज जैसा निस्वार्थ प्रेमी प्राप्त हो गया है, जिनके अहैतुक अनुराग को पाकर हम पूर्णतः कृत-कृत्य हो गए हैं। श्रीस्वामीजी करुणापूर्ण कामना करते हैं कि संसार के अन्य विमुख जीवों को भी इन करुणा-वरुणालय प्रेम-सिंधु श्रीबिहारीजी की पावन शरण प्राप्त हो। [4]
जगत प्रीति करि देखी नाहिनें गटी कौ कोऊ। [1]
छत्रपति रंक लौं देखे प्रकृति बिरोध बन्यों नहिं कोऊ॥ [2]
दिन जो गये बहुत जनमनि के ऐसें जाउ जिनि कोऊ। [3]
कहें श्रीहरिदास मीत भले पाये बिहारी ऐसौ पावौ सब कोऊ॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पद (15)
प्रस्तुत पद में स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज संसार की नश्वरता और यहाँ के स्वार्थपरक अनुराग का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण करते हैं।
वे कहते हैं कि इस जगत में हमने परिजनों, मित्रों और संबंधियों—सभी से प्रीति का अनुभव किया, किंतु कोई भी आत्मा का वास्तविक हितैषी सिद्ध न हुआ। लेशमात्र त्रुटि होते ही संबंध छिन्न-भिन्न हो गए; यहाँ निस्वार्थ प्रेम का सर्वथा अभाव है। [1]
निर्धन से लेकर वैभवशाली छत्रपतियों तक की प्रीति का अवलोकन करने पर यही ज्ञात हुआ कि प्रत्येक जीव केवल अपने स्वभाव और इंद्रिय-सुख की वासना का दास है। जहाँ 'स्वसुख' की अभिलाषा प्रधान हो, वहाँ विशुद्ध प्रेम का लेशमात्र भी प्रवेश संभव नहीं है; अतः ये सभी उस पारमार्थिक रस से वंचित हैं। [2]
श्रीस्वामीजी महाराज अब श्रीहरि के चरणों में विनय करते हैं कि अनंत जन्मों से हमने इस असार संसार में अपना अनुराग व्यर्थ ही व्यय किया है। अब हमारी यह व्याकुल प्रार्थना है कि हमारा एक भी क्षण इस कपटपूर्ण और स्वार्थमयी प्रीति की भेंट न चढ़े। [3]
अंतिम चरण में वे हर्षित होकर कहते हैं कि अब हमें प्रेम-कला के चूड़ामणि और नित्य-विहार में नित्य निमग्न रहने वाले प्राणप्रिय श्रीबिहारीजी महाराज जैसा निस्वार्थ प्रेमी प्राप्त हो गया है, जिनके अहैतुक अनुराग को पाकर हम पूर्णतः कृत-कृत्य हो गए हैं। श्रीस्वामीजी करुणापूर्ण कामना करते हैं कि संसार के अन्य विमुख जीवों को भी इन करुणा-वरुणालय प्रेम-सिंधु श्रीबिहारीजी की पावन शरण प्राप्त हो। [4]

