हमारे, मन भायो ब्रजधाम।
जहँ ज्ञानिन - आराध्य मुक्तिहूँ, निशिदिन रहति गुलाम। [1]
पानी भरति बनी पनिहारिनि, निदरतहूँ ब्रजभाम।
गहवरवन निधिवन वृंदावन, लतन-कुंज अभिराम। [2]
नाम रूप लीला गुन गावत, भावत श्यामा श्याम।
तृण सम लखत 'कृपालु' त्रिलोकहुँ, अरु बैकुण्ठ ललाम। [3]
- जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी ( 134)
हमारे मन को तो एकमात्र ब्रजधाम ही अच्छा लगता है। जहाँ ज्ञानियों की आराध्या देवी मुक्ति भी सदा दासता करती है। [1]
चारों मुक्ति ब्रजांगनाओं के अपमान करने पर भी पनिहारिन बनकर जहाँ पानी भरा करती हैं। गह्वर वन, वृन्दावन, निधिवन आदि में जहाँ सुन्दर लताओं के कुंज हैं वहीं पर श्यामा श्याम के नाम, रूप लीला, गुण को गाते हुए सुख पाते हैं। [2]
जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं कि हम इस सुख के आगे त्रैलोक्य तो क्या बैकुण्ठ के सुख को भी तृण के समान देखते हैं। [3]
जहँ ज्ञानिन - आराध्य मुक्तिहूँ, निशिदिन रहति गुलाम। [1]
पानी भरति बनी पनिहारिनि, निदरतहूँ ब्रजभाम।
गहवरवन निधिवन वृंदावन, लतन-कुंज अभिराम। [2]
नाम रूप लीला गुन गावत, भावत श्यामा श्याम।
तृण सम लखत 'कृपालु' त्रिलोकहुँ, अरु बैकुण्ठ ललाम। [3]
- जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी ( 134)
हमारे मन को तो एकमात्र ब्रजधाम ही अच्छा लगता है। जहाँ ज्ञानियों की आराध्या देवी मुक्ति भी सदा दासता करती है। [1]
चारों मुक्ति ब्रजांगनाओं के अपमान करने पर भी पनिहारिन बनकर जहाँ पानी भरा करती हैं। गह्वर वन, वृन्दावन, निधिवन आदि में जहाँ सुन्दर लताओं के कुंज हैं वहीं पर श्यामा श्याम के नाम, रूप लीला, गुण को गाते हुए सुख पाते हैं। [2]
जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं कि हम इस सुख के आगे त्रैलोक्य तो क्या बैकुण्ठ के सुख को भी तृण के समान देखते हैं। [3]

