धन्य-धन्य है जोई पुरान।
ताके मध्य श्रीवृन्दावन की कथा परम सुखदान॥ [1]
बिन वृन्दावन बानी मेरैं कबहुँ परो जिन कान।
नागर व्रज-वृन्दावन बिनको नहिं भावत भगवान॥ [2]
- श्री नागरीदास जी, वन जन प्रशंसा (3)
धन्य हैं वे शास्त्र जिनमें श्री वृंदावन धाम की सुंदर और अमृतमयी कथाएँ हैं। [1]
मेरे कान ऐसी कथा का श्रवण कभी ना करें जिसमे श्री वृन्दावन धाम की महिमा का वर्णन ना हो। श्री नागरीदास जी कहते हैं, "ब्रज वृन्दावन धाम की सीमा के बाहर भी कोई भगवान या श्री कृष्ण के स्वरुप में श्री हरि हों या उनकी लीला हो, तो भी मेरा मन वृन्दावन को छोड़ कर वहाँ नहीं जाता"। [2]
ताके मध्य श्रीवृन्दावन की कथा परम सुखदान॥ [1]
बिन वृन्दावन बानी मेरैं कबहुँ परो जिन कान।
नागर व्रज-वृन्दावन बिनको नहिं भावत भगवान॥ [2]
- श्री नागरीदास जी, वन जन प्रशंसा (3)
धन्य हैं वे शास्त्र जिनमें श्री वृंदावन धाम की सुंदर और अमृतमयी कथाएँ हैं। [1]
मेरे कान ऐसी कथा का श्रवण कभी ना करें जिसमे श्री वृन्दावन धाम की महिमा का वर्णन ना हो। श्री नागरीदास जी कहते हैं, "ब्रज वृन्दावन धाम की सीमा के बाहर भी कोई भगवान या श्री कृष्ण के स्वरुप में श्री हरि हों या उनकी लीला हो, तो भी मेरा मन वृन्दावन को छोड़ कर वहाँ नहीं जाता"। [2]

