अरे मन भजिलै नंदलला - श्री दामोदरदास जी

अरे मन भजिलै नंदलला - श्री दामोदरदास जी

अरे मन भजिलै नंदलला।
गृह बांननमें रह्यौ किन कोऊ पकरत नाहि पला॥ [1]
वेद पुरान संमृत यौं भाषौ याते नाहि भला।
दिन दिन बढ़त प्रताप चौगुनौ जैसैं चंद्रकला॥ [2]
काकौ धन काकौ गृह संपति काके सुत अबला।
दामोदर कछु थिर न रहैगौ जगमें चलीचला॥ [3]

- श्री दामोदरदास जी

हे मेरे मन, तू महाराज नंद के पुत्र श्री श्यामसुन्दर का भजन कर ले। चाहे तू गृहस्थ हो या वानप्रस्थ, बिना भजन के तेरा उद्धार संभव नहीं है। [1]

वेद और पुराण मिलकर यह कह रहे हैं की श्यामसुन्दर के भजन से उत्तम कोई दूसरा साधन नहीं है। नन्दनन्दन के भजन से जीव का ऐश्वर्या एवं प्रताप चंद्र की भांति दिन प्रतिदिन बढ़ते जाता है। [2]

श्री दामोदर दास कह रहे हैं "यह धन, गृह, संपत्ति, पुत्र, पत्नी, मित्र आज तक किसके हुए हैं, इस चलायमान सृष्टि में कुछ भी स्थिर नहीं रहेगा, यह शरीर भी छूट जाएगा, इसलिए हे मन, तू नन्दनन्दन का भजन कर ले।” [3]