जन्म एवं बाल्यकाल:
श्री भट्टदेवाचार्य जी के उपस्थिति - काल का कोई उपयुक्त प्रमाण नहीं मिलता हैं। इनका उपस्थिति - काल १५ वीं शताब्दीके अन्त और सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में माना जाता है । उनके माता - पिता के बारे में इतना ही ज्ञात है कि वे गौर ब्राह्मण थे और जिला हिसार ( हरियाणा ) के निवासी थे, पर भट्टजी के जन्म के पूर्व मथुरा में आकर बस गये थे । मथुरा में ही भट्टजी का जन्म हुआ ।
आध्यात्मिक जीवन:
श्री भट्टदेव जी श्रीकेशवकाशमीरी भट्टजीके शिष्य थे । श्रीकेशवकाशमीरी जी के बाद वे निम्बार्क सम्प्रदायके ३४ वें आचार्य हुए। श्री भट्टदेव जी उत्तर भारतके प्रथम व्यक्ति थे, जो निम्बार्क सम्प्रदाय के आचार्य हुए । वे निम्बार्क सम्प्रदाय के प्रथम वाणीकार थे, जिन्होंने ब्रजभाषा में अपनी रचनाएँ की थी। वे ही नम्बार्क सम्प्रदायके प्रथम आचार्य थे, जिन्होंने मधुर - भक्ति रस का विशेष रूप से प्रचार किया और राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं के चिंतन और कीर्तन को अपने जीवन का एक मात्रा लक्ष्य बनाया। श्री भट्टदेव जी आचार्यत्व ग्रहण करने के बाद अंत तक मथुरा में रहे। नारद टीला पर उनकी समाधि है।
शिष्य परम्परा:
उनके शिष्यों में निम्बार्क संप्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य श्री हरिव्यास देवाचार्य सर्वप्रधान थे ।
रचित ग्रन्थ:
'युगल शतक' इनके द्वारा रचित ग्रन्थ है । 'युगल शतक' में श्री भट्टदेव जी ने व्रज-लीला और निकुंज-लीला दोनों का सरस वर्णन किया है। कहते है की उन्होंने 'युगल शतक' के अतिरिक्त और बहुत से पदों की रचना की थी, जिनमें से कुछ पुराने कीर्तन संग्रहों में अब भी मिलते है । निम्बार्क संप्रदाय के रसोपासना के सिद्धांत का संक्षिप्त पर सुस्पष्ट वर्णन पहली बार श्री भट्टदेव जी के 'युगल शतक' में ही मिलता है।
लीलाएं:
श्री भट्टदेवाचार्य जी के जीवन कल में अनेक लीलाएं हुई जिनमें से दो लीलाएं निम्नप्रकार हैं:
1. एक बार श्री भट्टदेवाचार्य जी गर्मियों के समय में, ठीक मध्याह्न ( दोपहर ) का समय बैठे प्रिया प्रियतम की लीलाओं के पद गायन कर रहे थे, तभी उन्होंने एक पद गाया। पद निम्नप्रकार हैं -
"भीजत कब देखौं इन नैना ।
श्यामा जू की सुरंग चुनरिया , मोहन को उपरैंना । ।
जुगल किशोर कूंजतर ठाड़े , जतन कियो कछु मैं ना ।
उमड़ी घटा चहूँ दिसि श्रीभट्ट घिरि आई जल सेना । । "
- युगल - शतंक , पद सं ८८
भावार्थ- श्री भट्टदेवाचार्य जी पद गायन करते करते ये भाव कर रहे थे की," मैं कब यह देखूंगा की सुन्दर सुन्दर मेघ आ गए हैं और रिमझिम रिमझिम वर्षा हो रही हैं और श्री लाड़ली जू की सुरंग चूनरी और लाल जू का उपरैंना ( पीताम्बर ) भींज रहा हैं । और जुगल किशोर निकुञ्ज में एक लता के नीचे खड़े भींज रहे हैं। हाय ! मैंने ( श्री भट्टदेवाचार्य जी ) उनको भींजने से बचाने का कुछ उपाय भी नहीं किया ? वो ( श्री भट्टदेवाचार्य जी ) इतना सोच ही रहे थे की तत्काल मेघ छा गए,रिमझिम रिमझिम वर्षा होने लगी और दिव्य निकुंज का प्रादुर्भाव हो गया।
जैसा उन्होंने में पद में गायन किया ठीक वैसी ही लीला का दर्शन उनको हुआ।
2. श्री भट्टदेवाचार्य जी ने युगल शतक जैसे एक सौ शतक की रचना की । उन्होंने सारे शतकों को गुरुदेव श्रीकेशवकाशमीरी भट्टजी को समर्पित किये । श्री भट्टदेवाचार्य जी ने अपने गुरुदेव से कहा की गुरुदेव जैसा स्वरूप मैंने प्रिया- प्रियतम की लीलाओं का देखा हैं, उन्हें ही पदों में रचित किया हैं । श्रीकेशवकाशमीरी भट्टजी ने उनकी रचना को देखा और कहा कि," इस लोक में इन एकांतिक लीलाओं का कोई अधिकारी नहीं हैं अर्थात् कोई भी इस लोक इन एकांतिक लीलाओं के गूढ़ रहस्य को समझने के लायक नहीं हैं ।" तो उनके गुरुदेव ने आज्ञा दी कि आप ये सारे शतक श्री यमुना जी में अर्पित कर दो, फिर जो शतक यमुना जी निश्चय करके वापस दे उसे आप इस लोक के लिए प्रकाशित कर दे । तब केवल मात्र 'युगल शतक' यमुना जी में तैरता हुआ ऊपर आया और शेष शतक यमुना जी ने अपने महल में विराजमान कर लिए ।
श्री भट्टदेवाचार्य जी के उपस्थिति - काल का कोई उपयुक्त प्रमाण नहीं मिलता हैं। इनका उपस्थिति - काल १५ वीं शताब्दीके अन्त और सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में माना जाता है । उनके माता - पिता के बारे में इतना ही ज्ञात है कि वे गौर ब्राह्मण थे और जिला हिसार ( हरियाणा ) के निवासी थे, पर भट्टजी के जन्म के पूर्व मथुरा में आकर बस गये थे । मथुरा में ही भट्टजी का जन्म हुआ ।
आध्यात्मिक जीवन:
श्री भट्टदेव जी श्रीकेशवकाशमीरी भट्टजीके शिष्य थे । श्रीकेशवकाशमीरी जी के बाद वे निम्बार्क सम्प्रदायके ३४ वें आचार्य हुए। श्री भट्टदेव जी उत्तर भारतके प्रथम व्यक्ति थे, जो निम्बार्क सम्प्रदाय के आचार्य हुए । वे निम्बार्क सम्प्रदाय के प्रथम वाणीकार थे, जिन्होंने ब्रजभाषा में अपनी रचनाएँ की थी। वे ही नम्बार्क सम्प्रदायके प्रथम आचार्य थे, जिन्होंने मधुर - भक्ति रस का विशेष रूप से प्रचार किया और राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं के चिंतन और कीर्तन को अपने जीवन का एक मात्रा लक्ष्य बनाया। श्री भट्टदेव जी आचार्यत्व ग्रहण करने के बाद अंत तक मथुरा में रहे। नारद टीला पर उनकी समाधि है।
शिष्य परम्परा:
उनके शिष्यों में निम्बार्क संप्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य श्री हरिव्यास देवाचार्य सर्वप्रधान थे ।
रचित ग्रन्थ:
'युगल शतक' इनके द्वारा रचित ग्रन्थ है । 'युगल शतक' में श्री भट्टदेव जी ने व्रज-लीला और निकुंज-लीला दोनों का सरस वर्णन किया है। कहते है की उन्होंने 'युगल शतक' के अतिरिक्त और बहुत से पदों की रचना की थी, जिनमें से कुछ पुराने कीर्तन संग्रहों में अब भी मिलते है । निम्बार्क संप्रदाय के रसोपासना के सिद्धांत का संक्षिप्त पर सुस्पष्ट वर्णन पहली बार श्री भट्टदेव जी के 'युगल शतक' में ही मिलता है।
लीलाएं:
श्री भट्टदेवाचार्य जी के जीवन कल में अनेक लीलाएं हुई जिनमें से दो लीलाएं निम्नप्रकार हैं:
1. एक बार श्री भट्टदेवाचार्य जी गर्मियों के समय में, ठीक मध्याह्न ( दोपहर ) का समय बैठे प्रिया प्रियतम की लीलाओं के पद गायन कर रहे थे, तभी उन्होंने एक पद गाया। पद निम्नप्रकार हैं -
"भीजत कब देखौं इन नैना ।
श्यामा जू की सुरंग चुनरिया , मोहन को उपरैंना । ।
जुगल किशोर कूंजतर ठाड़े , जतन कियो कछु मैं ना ।
उमड़ी घटा चहूँ दिसि श्रीभट्ट घिरि आई जल सेना । । "
- युगल - शतंक , पद सं ८८
भावार्थ- श्री भट्टदेवाचार्य जी पद गायन करते करते ये भाव कर रहे थे की," मैं कब यह देखूंगा की सुन्दर सुन्दर मेघ आ गए हैं और रिमझिम रिमझिम वर्षा हो रही हैं और श्री लाड़ली जू की सुरंग चूनरी और लाल जू का उपरैंना ( पीताम्बर ) भींज रहा हैं । और जुगल किशोर निकुञ्ज में एक लता के नीचे खड़े भींज रहे हैं। हाय ! मैंने ( श्री भट्टदेवाचार्य जी ) उनको भींजने से बचाने का कुछ उपाय भी नहीं किया ? वो ( श्री भट्टदेवाचार्य जी ) इतना सोच ही रहे थे की तत्काल मेघ छा गए,रिमझिम रिमझिम वर्षा होने लगी और दिव्य निकुंज का प्रादुर्भाव हो गया।
जैसा उन्होंने में पद में गायन किया ठीक वैसी ही लीला का दर्शन उनको हुआ।
2. श्री भट्टदेवाचार्य जी ने युगल शतक जैसे एक सौ शतक की रचना की । उन्होंने सारे शतकों को गुरुदेव श्रीकेशवकाशमीरी भट्टजी को समर्पित किये । श्री भट्टदेवाचार्य जी ने अपने गुरुदेव से कहा की गुरुदेव जैसा स्वरूप मैंने प्रिया- प्रियतम की लीलाओं का देखा हैं, उन्हें ही पदों में रचित किया हैं । श्रीकेशवकाशमीरी भट्टजी ने उनकी रचना को देखा और कहा कि," इस लोक में इन एकांतिक लीलाओं का कोई अधिकारी नहीं हैं अर्थात् कोई भी इस लोक इन एकांतिक लीलाओं के गूढ़ रहस्य को समझने के लायक नहीं हैं ।" तो उनके गुरुदेव ने आज्ञा दी कि आप ये सारे शतक श्री यमुना जी में अर्पित कर दो, फिर जो शतक यमुना जी निश्चय करके वापस दे उसे आप इस लोक के लिए प्रकाशित कर दे । तब केवल मात्र 'युगल शतक' यमुना जी में तैरता हुआ ऊपर आया और शेष शतक यमुना जी ने अपने महल में विराजमान कर लिए ।

