अप्रेक्षे कृत निश्चयापि - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (230)

अप्रेक्षे कृत निश्चयापि - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (230)

अप्रेक्षे कृत निश्चयापि सुचिरं वीक्षेत दृक्कोणतो, मौने दार्ढ्यमुपाश्रितापि निगदेत्तामेव याहीत्यहो।
अस्पर्शे सुधृताशयापि करयोर्धृत्वा वहिर्यापये- द्वाधाया इति मानदस्थितिमहं प्रेक्षे हसन्ती कदा॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (230)

यद्यपि [श्रीप्रियाजी ने प्रियतम की ओर] न देखने का निश्चय कर लिया है, फिर भी नेत्र-कोणों से [उनकी ओर] देर तक देखती ही रहती हैं। अहो ! [आश्चर्य है] मौन का दृढ़ता-पूर्वक आश्रय लेकर भी "वहीं चले जाओ" इस प्रकार कह ही देती हैं एवं स्पर्श न करने का निश्चय करके भी उन्हें दोनों हाथ पकड़कर बाहर निकालती हैं। मैं हंसते-हंसते श्रीराघा के मान की इस दुःस्थिति को कब देखूँगी ?