(कवित्त)
कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी प्यारी,
अरज हमारी सुकमारी कान कीजै री। [1]
भ्रमना भ्रमावै छिन छिन अकुलावै मन,
कछुना सुहावै उर धीरज धरीजै री॥ [2]
'लाल बलबीर' दासी चेरी हैं चरन ही की,
सरन लई हैं सो निभाय मोहि लीजै री। [3]
कीजै दीन जान दान एहो करुनानिधान,
सदा तेरौ ध्यान औ निकुंज बास दीजै री॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, राधा शतक (98)
हे वृषभानु दुलारी श्री राधे, कृपया मेरी प्रार्थना को सुनिए। (1)
मेरा मन अत्यंत व्याकुल है (आप से विलग होने के कारण), मुझे कुछ नहीं भाता। मुझे धीरज प्रदान कीजिये। (2)
श्री लाल बलवीर कहते हैं कि "मैं आपके चरण कमलों की नित्य दासी हूँ एवं मैंने आपकी ही शरण ली है, हे सुकुमारी, मैं कैसा भी हूँ आपका हूँ, कैसे भी करके मुझे अपना जानकर, मुझसे निभा लीजिये।" (3)
हे करुणानिधान, मैं समस्त साधनों से रहित और निराश्रित हूँ, मुझे दीन जान कृपया मुझपर करुणा कीजिये जिससे कि मुझे सदैव आपके रूप का ध्यान होता रहे और आपके निकुंज का अनवरत वास प्राप्त हो। (4)
कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी प्यारी,
अरज हमारी सुकमारी कान कीजै री। [1]
भ्रमना भ्रमावै छिन छिन अकुलावै मन,
कछुना सुहावै उर धीरज धरीजै री॥ [2]
'लाल बलबीर' दासी चेरी हैं चरन ही की,
सरन लई हैं सो निभाय मोहि लीजै री। [3]
कीजै दीन जान दान एहो करुनानिधान,
सदा तेरौ ध्यान औ निकुंज बास दीजै री॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, राधा शतक (98)
हे वृषभानु दुलारी श्री राधे, कृपया मेरी प्रार्थना को सुनिए। (1)
मेरा मन अत्यंत व्याकुल है (आप से विलग होने के कारण), मुझे कुछ नहीं भाता। मुझे धीरज प्रदान कीजिये। (2)
श्री लाल बलवीर कहते हैं कि "मैं आपके चरण कमलों की नित्य दासी हूँ एवं मैंने आपकी ही शरण ली है, हे सुकुमारी, मैं कैसा भी हूँ आपका हूँ, कैसे भी करके मुझे अपना जानकर, मुझसे निभा लीजिये।" (3)
हे करुणानिधान, मैं समस्त साधनों से रहित और निराश्रित हूँ, मुझे दीन जान कृपया मुझपर करुणा कीजिये जिससे कि मुझे सदैव आपके रूप का ध्यान होता रहे और आपके निकुंज का अनवरत वास प्राप्त हो। (4)

