भाइ बिना भटकट फिरे, परमार्थ व्यौहार।
भूखौई घर परी रहै, बिना आहार विहार॥
-.श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (538)
प्रायः लोग सच्चे भाव के बिना परमार्थ और व्यवहार में ही इधर-उधर अनेक आशाएँ बाँधे भटकते रहते हैं। परन्तु नित्य-विहार के अनन्य उपासक तो विहार-रूपी आहार के बिना किसी अन्य परमार्थ को स्पर्श भी नहीं करते, चाहे वे भूखे ही घर पर पड़े रहें।
भूखौई घर परी रहै, बिना आहार विहार॥
-.श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (538)
प्रायः लोग सच्चे भाव के बिना परमार्थ और व्यवहार में ही इधर-उधर अनेक आशाएँ बाँधे भटकते रहते हैं। परन्तु नित्य-विहार के अनन्य उपासक तो विहार-रूपी आहार के बिना किसी अन्य परमार्थ को स्पर्श भी नहीं करते, चाहे वे भूखे ही घर पर पड़े रहें।

