पतित पावनी प्यारी हमारी। [1]
जब सुभाव हिय समझत तेरौ, हर्ष होत अति भारी॥ [2]
पतित शिरोमणि मैं अघ खानी, तजत सुभाव न जैसे। [3]
त्रिभुवन विदित कृपालु स्वामिनी, आपुन तजिय कि तैसे॥ [4]
हौं चलि हौं हठ पंथ नरक की, बरबस आइ बचैहौ। [5]
करि हौं पातक पुंज कोटि विधि, सकल मेटि मुसिकैहौ॥ [6]
विषय पंक मोहि मग्न देखी कै, लैहौ दौरि उबारी। [7]
सहज कृपालु बान पर भोरी, बार-बार बलिहारी॥ [8]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (37)
इस पद में श्री भोरी सखी जी वर्णन कर रहे हैं:
हमारी स्वामिनी श्री राधा पतित को पावन करने वाली हैं। [1]
श्री प्यारी जू का यह स्वभाव देखकर मेरे हृदय में बड़ा भारी हर्ष हो रहा है। [2]
समस्त पतितों में मैं पतित शिरोमणि एवं पतितों की खान हूँ और मैं अपने इस स्वभाव का त्याग भी नहीं कर रहा हूँ। [3]
और तीनों लोकों में यह विदित है कि आप कृपालु हैं और आप भी अपने इस स्वभाव का किसी भी परिस्थिति में त्याग नहीं करतीं। [4]
मैं तो हठ पूर्वक नरक के पथ पर चल रहा हूँ परंतु आप आकर मुझे बचा लेती हैं। [5]
मैं पातकी अपने स्वभाव वश विधि पूर्वक पाप किए जा रहा हूँ परंतु आप मेरे उन पापों को बार बार मिटा कर मुस्कुरा रही हैं। [6]
विषय सुख में मुझे मग्न देख कर आप मुझे तुरत हाथ पकड़ कर उबार लेती हैं एवं विषय संसार से मेरी रक्षा कर रही हैं। [7]
श्री भोरी सखी कह रही हैं कि "हे कृपालुता की राशि श्री प्यारी जू, आपके इस कृपालु स्वभाव पर मैं बार-बार बलिहारी जाती हूँ।" [8]
जब सुभाव हिय समझत तेरौ, हर्ष होत अति भारी॥ [2]
पतित शिरोमणि मैं अघ खानी, तजत सुभाव न जैसे। [3]
त्रिभुवन विदित कृपालु स्वामिनी, आपुन तजिय कि तैसे॥ [4]
हौं चलि हौं हठ पंथ नरक की, बरबस आइ बचैहौ। [5]
करि हौं पातक पुंज कोटि विधि, सकल मेटि मुसिकैहौ॥ [6]
विषय पंक मोहि मग्न देखी कै, लैहौ दौरि उबारी। [7]
सहज कृपालु बान पर भोरी, बार-बार बलिहारी॥ [8]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (37)
इस पद में श्री भोरी सखी जी वर्णन कर रहे हैं:
हमारी स्वामिनी श्री राधा पतित को पावन करने वाली हैं। [1]
श्री प्यारी जू का यह स्वभाव देखकर मेरे हृदय में बड़ा भारी हर्ष हो रहा है। [2]
समस्त पतितों में मैं पतित शिरोमणि एवं पतितों की खान हूँ और मैं अपने इस स्वभाव का त्याग भी नहीं कर रहा हूँ। [3]
और तीनों लोकों में यह विदित है कि आप कृपालु हैं और आप भी अपने इस स्वभाव का किसी भी परिस्थिति में त्याग नहीं करतीं। [4]
मैं तो हठ पूर्वक नरक के पथ पर चल रहा हूँ परंतु आप आकर मुझे बचा लेती हैं। [5]
मैं पातकी अपने स्वभाव वश विधि पूर्वक पाप किए जा रहा हूँ परंतु आप मेरे उन पापों को बार बार मिटा कर मुस्कुरा रही हैं। [6]
विषय सुख में मुझे मग्न देख कर आप मुझे तुरत हाथ पकड़ कर उबार लेती हैं एवं विषय संसार से मेरी रक्षा कर रही हैं। [7]
श्री भोरी सखी कह रही हैं कि "हे कृपालुता की राशि श्री प्यारी जू, आपके इस कृपालु स्वभाव पर मैं बार-बार बलिहारी जाती हूँ।" [8]

