यशोभिः पूरिता आशा कृतं विश्वानुरंजनम्।
हा हन्त दिड् मात्रमपि नेक्षे वृन्दावनेशयोः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.32)
अनेक यश-कीर्त्ति से दशों दिशाएं पूर्ण हो चुकीं, विश्व का अनुरंजन (प्रससन्न करना) भी कर दिया, किन्तु हाय! श्रीवृन्दावनाधीश (श्रीयुगल-किशोर) की ओर देख मात्र भी नहीं सका।
हा हन्त दिड् मात्रमपि नेक्षे वृन्दावनेशयोः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.32)
अनेक यश-कीर्त्ति से दशों दिशाएं पूर्ण हो चुकीं, विश्व का अनुरंजन (प्रससन्न करना) भी कर दिया, किन्तु हाय! श्रीवृन्दावनाधीश (श्रीयुगल-किशोर) की ओर देख मात्र भी नहीं सका।

